बवासीर का ईलाज

बवासीर का ईलाज

बवासीर

बवासीर एक खतरनाक बीमारी है गुदा के पास सूजन नसों को बवासीर के रूप में जाना जाता है। बवासीर दो प्रकार की होती है| बवासीर को आम भाषा में खूनी और बादी बवासीर भी कहते हैं जिनका वर्णन इस प्रकार से है:-

1.खूनी बवासीर- खूनी बवासीर में किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होती सिर्फ खून आता है इसका मुख्य कारण मस्सा है जो अंदर की तरफ होता है फिर बाद में बाहर आने लगता है|

2.बादी बवासीर- बादी बवासीर होने पर पेट खराब रहता है व गैस बन जाती है| कब्ज बनी रहती है| बवासीर की वजह से पेट खराब रहता है इस में दर्द, जलन ,खुजली व शरीर में बेचैनी इत्यादि यह लक्षण सामने आते हैं|

बवासीर
बवासीर

बवासीर के लक्षण

  • मल त्याग करते समय गुदाद्वार में दर्द सा महसूस होना|
  • बवासीर होने पर कई बार रोगी को मल त्याग करने के बाद भी ऐसा लगता है कि उसका पेट अभी साफ नहीं हुआ |यह बवासीर के मस्से होने का प्रथम लक्षण  है|
  • मल त्याग शौच करते समय गुदाद्वार में खून निकलना बवासीर का  मुख्य कारण है|
  • गुदाद्वार की नसों में जब किसी कारण वश दबाव पड़ता है तो उन में सूजन आ जाती है जिसे हम मस्सा कहते हैं|
  • बवासीर होने पर गुदाद्वार में से श्लेष्मा भी निकलता है|
  • गुदा के आसपास चरम खुजली।

बवासीर के कारण

  1. रक्त -इसे खुनी बवासीर भी कहते हैं इसमें रक्त गिरता है|
  2. कड़वा खट्टा नमकीन वस्तुओं को अधिक आना, अधिक कसरत करना ,धूप में अधिक रहना , गरम देश में रहना व गरम पदार्थों का खाना आदि मुख्य कारण है|
  3. दवाओं का सेवन करना अत्यधिक दवाओं का सेवन करने से भी बवासीर हो जाता है
  4. भोजन में पोषक तत्वों की कमी के कारण भी बवासीर हो जाता है|
  5. अधिक तला या मसालेदार भोजन खाने से भी बवासीर की समस्या उत्पन्न हो जाती है|
  6. प्रसव  के दौरान भी बवासीर होने  की संभावना बढ़ जाती है

बवासीर को दूर करने के आयुर्वेदिक नुस्खे

1.प्याज के रस में घी और चीनी मिलाकर खाने से बवासीर नष्ट हो जाती है|

2.काले तिल 1 तोला तोले भर मक्खन में मिलाकर सुबह सुबह रोज खाने से 8 दिन में खूनी बवासीर आराम हो जाती है|

3.जंगली गोभी की तरकारी घी में पकाकर और सेंधा नमक डालकर रोटी के साथ 8 दिन खाने से बवासीर नष्ट हो जाती है|असीस, कूड़े की छाल ,इंद्रजौ और रसौत इनके चूर्ण को शहद में मिलाकरचावलों के पानी के साथ लेने से खूनी बवासीर ठीक हो जाती है|

Broccoli
Broccoli( जंगली गोभी )

4.काले तिलों का चूर्ण, नागकेसर और मिश्री इन सब को पीसकर मक्खन में मिलाकर खाने से बवासीर में आराम मिलता है|

5.नागकेसर और मिश्री छह- छह माशे से लेकर 9 माशे ताजा मक्खन में मिलाकर सुबह शाम खाने से 7 दिन में खाने से खूनी बवासीर में आराम मिलता है|

6.कड़वी नीम के पके हुए फलों को गुदा 3 माह लेकर 6 माशे से गुड में मिलाकर 7 दिन तक खाने से बवासीर में आराम मिलता है|प्याज के महीन टुकड़े करके धूप में सुखा लें| सुखे टुकड़ों में से एक तोला प्याज लेकर घी मे तले फिर उसमें एक माशे  तिल और दो तोले मिश्री मिलाकर हर रोज सेवन करें इससे बवासीर में आराम मिलता है|कमल का नरम पत्ता पीसकर मिश्री के साथ खाने से बवासीर में आराम मिलता है|

7.सवेरे ही बकरी का दूध पीने से बवासीर का खून बंद हो जाता है|

8.गेंदे की पत्तियां 6 मासी से 1 तोले तक और काली मिर्च 2 मासी से 3 मासी तक  इकट्ठा कर ले और पीस छानकर पी जाए इससे बवासीर का खून बंद हो जाता है|

9.कमल की केसर, शहद,ताजा मक्खन, चीनी और नागकेसर सब को एक में मिलाकर खाने से बवासीर का खून बंद हो जाता है|

10.आम की कोपल पानी में पीस जानकर थोड़ी शक्कर मिलाकर पीने से बवासीर का खून बंद हो जाता है|

11.एक नारियल के ऊपर का छिलका लेकर जलाएं और उसकी राख के बराबर शक्कर मिलाकर तीन खुराक बनाए| इसको एक- एक खुराक हर रोज सेवन करने से बवासीर का खून बंद हो जाता है|

किडनी स्टोन यानी पथरी( Kidney stone pain)

किडनी स्टोन ( Kidney stone pain)

किडनी स्टोन यानी पथरी एक छोटे आकार का पत्थर होता है जो कैलशियम मिनिरल्स सॉल्ट और अन्य अक्ष आर्य तत्वों के मिलने से धीरे-धीरे बड़े कठोर पत्थर के रूप में मूत्र मार्ग में बाधा उत्पन्न करता है जो किडनी स्टोन छोटी होती है किडनी स्टोन आसानी से मूत्र वाहिनी से बाहर निकल जाती है लेकिन जब यह बड़ी हो जाती है तो पेट के निचले हिस्से में दर्द होना शुरू हो जाता है और सूजन आ जाती है जिससे मूत्र मार्ग में संक्रमण हो जाता है|

kidney stone
किडनी स्टोन ( kidney stone )

किडनी स्टोन के लक्षण(kidney stone symptoms)

  • किडनी स्टोन से पीड़ित लोगों का यूरिन गुलाबी लाल या भूरे रंग का आने लगता है पेशाब करने में दिक्कत आ सकती है|
  • किडनी स्टोन से पीड़ित लोगों को पेट के निचले हिस्से में दर्द रहने लगता है और यह दर्द कुछ मिनटों या घंटों तक बना रहता है|
  • किडनी स्टोन के शुरूआती लक्षण में से  एक है उल्टी आना उल्टी दो कारणों से बाहर आती है |पहला स्टोन की स्थानांतरण के कारण और दूसरा किडनी शरीर के अंदर की गंदगी को बाहर निकालने में मदद करती है|
  • किडनी रोग से पीड़ित व्यक्ति का यूरिन मटमैला और बदबूदार होता है|
  • इस रोग में तेज बुखार और ठंड लगने की संभावना होती है|
  • किडनी स्टोन के बड़ा होने पर यह मूत्राशय को ब्लॉक कर देती है जिससे किडनी में दर्दनाक सूजन पैदा हो जाती है और पेट और कमर में दर्द का अनुभव होने लगता है|
  • किडनी स्टोन बड़ा होने पर व्यक्ति को बैठने में परेशानी हो सकती है|
  • किडनी स्टोन के मूत्र मार्ग से मूत्राशय में चले जाने पर बेहद दर्दनाक होता है|

किडनी स्टोन के कारण (Kidney stone causes)

1.प्रोस्टेड फूड का अधिक सेवन करने से-

प्रोस्टेडफूड का अधिक सेवन करने से किडनी स्टोन की समस्या हो सकती है प्रोस्टेड में सोडियम की मात्रा अधिक होती है जिससे मूत्र मार्ग में सोडियम की मात्रा बढ़ती है| साथ ही साथ कैल्शियम का अधिक उत्सर्जन होने लगता है |प्रोस्टेट फूड में फाइबर की मात्रा कम होती है जिससे यूरिक एसिड की प्रक्रिया में रुकावट आती है|

2.सॉफ्ट ड्रिंक का सेवन करने से-

सॉफ्ट ड्रिंक्स और कैफीन युक्त पेय पदार्थों का सेवन करने से शरीर में कैल्शियम को ग्रहण करने की क्षमता कम हो जाती है जिससे कैल्शियम के उत्सर्जन की संभावना बढ़ जाती है जो किडनी स्टोन का कारण बनती है|

पानी की कमी से पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन कम करने से शरीर में किडनी स्टोन रोग की समस्या उत्पन्न हो जाती है|

3.अनुवांशिकता-कुछ लोगों को अनुवांशिकता के कारण गुर्दे की पथरी की समस्या हो जाती है| कैल्शियम का स्तर बढ़ने के कारण यह समस्या उत्पन्न होती है|

4.मोटापा -किडनी स्टोन का मुख्य कारण मोटापा है|

5.दवाओं का सेवन करने से– कैल्शियम वाली एंटासिड लेने वाले लोगों की मूत्र में कैल्शियम का स्तर बढ़ जाता है| विटामिन डी से भी कैल्शियम का स्तर बढ़ जाता है इसके कारण किडनी स्टोन की समस्या उत्पन्न होती है|

6.सिगरेट- सिगरेट किडनी पर बहुत बुरा प्रभाव डालती है जिससे वे काम करना भी बंद कर देती हैं धूम्रपान करने से धमनियां कड़ी हो जाती है जिससे किडनी के रक्त प्रभाव में रुकावट पैदा होती है और उसके कार्य करने की क्षमता पर भी गहरा असर पड़ता है|

7.सोडियम का अधिक सेवन किडनी रोग होने पर हमें सोडियम से भरपूर खाद्य पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए  सोडियम सीधे किडनी को प्रभावित करता है क्योंकि यह ब्लड प्रेशर को बनाए रखने में मदद करता है |

8.अत्यधिक शराब का सेवन शराब का सेवन करने से किडनी की कोशिका क्षतिग्रस्त होने लगती है और किडनी के आकार में वृद्धि हो सकती है|

(किडनी स्टोन के लिए आयुर्वेदिक उपाय)Kidney stone treatment

1. किडनी स्टोन रोग से बचने के लिए अत्यधिक मात्रा में पानी का सेवन करना चाहिए दिन में कम से कम 2 से 3 लीटर पानी जरूर पीना चाहिए|

2.प्रतिदिन 5 से 6 महीने तक तुलसी के रस में शहद मिलाकर पीने से किडनी स्टोन आसानी से पेशाब के रास्ते से बाहर निकल जाता है|

3.अनार और उसके जूस का सेवन करने से किडनी स्टोन से बचा जा सकता है|

4. तरबूज में पोटैशियम और मैग्नीशियम भरपूर मात्रा में पाया जाता है जो पानी की कमी को पूरा करता है यह मूत्र मार्ग में एसिड की मात्रा को नियंत्रित रखने में मदद करता है|

5. नींबू का रस, चार टुकड़े तरबूज के, चार बर्फ के टुकड़े, एक संतरा आदि सबको पीसकर जूस बना लें और रोजाना इसका सेवन करें|

6.करेले का जूस के रूप में सेवन करें| प्रतिदिन एक गिलास करेले का जूस पिए|

7.प्रतिदिन एक गिलास मूली का रस पीने से पथरी  जल्दी 21 दिनों के भीतर निकल जाती है|

8.प्रतिदिन पत्थरचट्टा के पत्तों का काढ़ा बनाकर पिएं 15 दिन में किडनी स्टोन नामक रोग से आराम मिल जाएगा|

9.प्रतिदिन एक गिलास अजवाइन का जूस पीने से भी किडनी स्टोन की समस्या खत्म हो जाती है|

10. नारियल पानी का सेवन करने से किडनी स्टोन की समस्या दूर होती है |

Ajwain
अजवाइन ( Ajwain )

प्रोस्टेट कैंसर(Prostate cancer)

प्रोस्टेट कैंसर(Prostate cancer )

प्रोस्टेट या गदूद एक सेब के आकार का यौन अंग होता है |प्रोस्टेट शरीर में पाई जाने वाली एक ग्रंथि होती है यह केवल पुरुषों में पाई जाती जो उनके प्रजनन प्रणाली का एक अंग है| पुरुष ग्रंथि मूत्र मार्ग के चारों ओर होती है |मूत्र मार्ग मूत्र को मूत्राशय से लिंग के रास्ते से बाहर निकालता है| पुरुषों में प्रोस्टेट ग्रंथि का आकार 25 साल की उम्र के बाद बढ़ने लगता है| कई अवस्थाओं में प्रोस्टेट का आकार सामान्य से अधिक होता है| प्रोस्टेट की कोशिकाएं धीरे-धीरे बढ़ने लगती हैं| जिससे यह ग्रंथि सामान्य से ज्यादा बढ़ने लगती है |इससे मुत्र मार्ग पर दबाव पड़ता है और कई समस्याएं उत्पन्न  होती है |प्रोस्टेट ग्रंथि को दो भागों में बांटा जाता है दाएं और बाएं| एक व्यस्क पुरुष में प्रोस्टेट ग्रंथि का आकार 3 सेंटीमीटर मोटा और 4 सेंटीमीटर चौड़ा होता है और इसका वेट यानी वजन 20 ग्राम तक हो सकता है|

Prostate_Cancer
प्रोस्टेट कैंसर ( Prostate_Cancer )

प्रोस्टेट कैंसर की घटना दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है |प्रोस्टेट कैंसर प्रोस्टेट की कोशिकाओं से बनने वाला कैंसर होता है| प्रोस्टेट कैंसर बहुत धीरे बढ़ता है| शुरुआत में तो इसके लक्षण दिखाई नहीं देते |जब यह लास्ट स्टेज पर पहुंचता है लक्षण दिखाई देने लगते हैं और कई बार मरीजों को यह पता भी नहीं लगता कि उन्हें प्रोस्टेट कैंसर है| व्यक्ति की मृत्यु होने की संभावना बढ़ जाती है|

प्रोस्टेट कैंसर के लक्षण(Prostate cancer symptoms)

  • पेशाब का बार बार आना|
  • पेशाब करने की इच्छा बार बार होना और निष्कासित करते वक्त मूत्र में रुकावट होना|
  • कई बार मूत्र के साथ रक्त का निकलना इस रोग का मुख्य लक्षण है|
  • पेशाब करने के दौरान जलन और कठिनाई का अनुभव होना और मूत्र की बूंद टपकना|
  • कमर में दर्द होना कूल्हो  और जांघ की ऊपरी सतह में दर्द होना|
  • लगातार वजन कम होना भी प्रॉस्टेट कैंसर का लक्षण है। शरीर का वजन तेजी से कम होना भी कैंसर की ओर इशारा है।
  •  जब पाचन क्रिया सही तरह से काम न करे तो समझ लेना चाहिए कि आप प्रोस्टेट कैंसर की चपेट में हैं। वहीं प्रॉस्टेट कैंसर से व्यक्ति के शरीर की बीमारी से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है।
  • शरीर के किसी भी हिस्से में दर्दहोना इस रोग का मुख्य लक्षण है|

प्रोस्टेट कैंसर के कारण(Prostate cancer causes)

  • अनुवांशिकता– अगर आपके परिवार में पुरुषों को प्रोस्टेट कैंसर था तो  आपको इस रोग के होने की संभावना बढ़ सकती है|
  • बढ़ती उम्र– उम्र के बढ़ने के साथ-साथ प्रोस्टेट कैंसर के होने की आशंका बढ़ जाती है| यह 25 वर्ष की उम्र के बाद होने लग जाता है|
  • हारमोंस में परिवर्तनप्रोस्टेट कैंसर का मुख्य कारण हारमोंस में परिवर्तन होना है| वसा हार्मोन का उत्पादन और शरीर में ऊंचाहार टेस्टोस्टेरोन के उत्पादन  प्रोस्टेट कैंसर होने का मुख्य कारण है|
  • धूम्रपान– धूम्रपान करना ,बीड़ी सिगरेट शराब का सेवन करने से भी पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर की संभावना बढ़ जाती है| यह कैंसर धीरे धीरे फैलने लगता है| शुरुआत में इसके लक्षण नजर नहीं आते इसलिए कई पुरुषों को पता भी नहीं लग पाता कि उन्हें प्रोस्टेट कैंसर है|
  • केमिकल्स के संपर्क में आना केमिकल्स के संपर्क में आने से भी पुरुष इस रोग का शिकार हो जाते हैं|
  • आहार कारक-मछली मांस सोयाबीन उत्पाद चावल डेयरी उत्पादों का सेवन करते रहने से भी प्रोस्टेट कैंसर होने की आशंका बनी रहती है|

प्रोस्टेटकैंसर स्टेजिज(Prostate cancer stages)

प्रोस्टेट कैंसर को चार चरणों में विभाजित किया जा सकता है:

स्टेज 1. पहले चरण में कैंसर बहुत छोटा होता है और पुरुष ग्रंथि तक ही सीमित रहता है|

स्टेज2.दूसरे चरण में कैंसर पुरुष ग्रंथि में ही होता है लेकिन इसका आकार बड़ा हो जाता है|

स्टेज3.तीसरे चरण में कैंसर प्रोस्टेट के बाहर फैल चुका है और वीर्य को ले जाने वाली ट्यूब्स तक फैल जाता है|

स्टेज4. चौथे चरण में कैंसर प्रोस्टेट ग्रंथि से बाहर के नजदीक ढांचे जैसे लसिका ग्रंथि मूत्राशय या फिर हड्डियों या लीवर जैसे दूर के अंगों में फैल जाता है|

प्रोस्टेट कैंसर किस उम्र के लोगों को होता है?(Prostate cancer age)

प्रोस्टेट कैंसर के बारे मे सबसे पहले हमने यह जाना कि प्रोस्टेट कैंसर किन कारणों की वजह से होता है उम्र के बढ़ने के साथ-साथ इस रोग के होने की आशंका बढ़ जाती है यह रोग 25 वर्ष की आयु के बाद होने लगता है 40 वर्ष से कम आयु के पुरुषों में यह रोग कम देखने को मिलता है लेकिन 60 वर्ष से 70 वर्ष की आयु के पुरुषों में यह रोग अधिक देखने को मिलता है|

प्रोस्टेट कैंसर के लिए टेस्ट(Prostate cancer test)

1.PSA  Testरक्त परीक्षण(prostate Specific Antigen)

प्रोस्टेट कैंसर की जांच के लिए प्रॉस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन(prostate Specific Antigen)नामक टेस्ट किया जाता है प्रोस्टेट नामक रसायन का स्तर बढ़ जाने पर प्रोस्टेट कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है प्रोस्टेट कैंसर का पता लगाने के लिए बायोप्सी नामक टेस्ट किया जाता है पता लगाया जा सकता है कि प्रोस्टेट कैंसर इतनी शीघ्रता से फैल रहा है| पीएसी के आधार पर ही डॉक्टर बायोप्सी की सलाह देते हैं प्रोस्टेट कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों को प्रभावित न करें इसके लिए सीटी स्कैन  बोन स्कैन टेस्ट भी किया जाता है|

1.PSAप्रॉस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन की जांचने के लिए खून का एक सैंपल लिया जाता है| पीएसए प्रोस्टेट द्वारा बनाया गया एक प्रोटीन है प्रोस्टेट के कैंसर से ग्रस्त पुरुषों के खून में पीएसए के बढ़े हुए सतर होते हैं प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित कुछ पुरुषों में सामान्य पीएसए होता है| पीएसए का सामान्य से ऊंचा  स्तर प्रोस्टेट का कैंसर के कारण हो सकता है| ऐसा मानने पीएसएस ऊपर वाले पुरुषों को आमतौर पर औरपरीक्षणों के लिए भेजा जाता है।

2.बायोप्सी-एक बायोप्सी शरीर से लिया गया ऊतक का एक नमूना है ताकि इसे और अधिक बारीकी से जांच की जा सके।बायोप्सी एक सुई से ली जाती है जोकि पीछे के मार्ग  की दीवार से डाली जाती है इसे TRUS बायोप्सी कहते हैं| बायोप्सी अल्ट्रासाउंड के साथ ही की जाती है| बायोप्सी वृषण के पीछे की त्वचा से भी ली जा सकती है| इसे ट्रांसपेरिनियल बायोप्सी कहते हैंऐसा भी हो सकता है कि प्रोस्टेट में कैंसर हो पर वह बायोप्सी से पता नहीं लगाया जाए ऐसे कैंसर का पता लगाने के लिए एमआरआई स्कैन भी किया जा सकता है फिर बायोप्सी को फिर से करना पड़ सकता है यदि पीएसए का सत्र बढ़ने लगे तो बायोप्सी को फिर से किया जा सकता है|

3.MRI(Magnetic Resonance Imaging)-एमआरआई के लिए शक्तिशाली चुंबक  रेडियो किरणों और कंप्यूटर का प्रयोग किया जाता है जिसकी मदद से शरीर की जानकारी को विस्तृत तस्वीरों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है एमआरआई स्कैन का इस्तेमाल शरीर के लगभग हर हिस्से को जांचने के लिए किया जाता है जैसे अंदरुनी अंग लीवर गर्भाशय और पुरुष ग्रंथि आदि की जांच की जाती है|

अतिरिक्त जांच यदि बायोप्सी में पता लग जाता है कि कैंसर है तो वह प्रोस्टेट ग्रंथि से आगे फैला है या नहीं इसका पता करने के लिए अतिरिक्त टेस्टों की आवश्यकता पड़ सकती है| जिम में शामिल है :हड्डियों का स्कैन, सीटी स्कैन ,एक्स रे|

प्रोस्टेट कैंसर से बचने के लिए आयुर्वेदिक उपाय

1.लहसुन– लहसुन में एंटी ऑक्सीडेंट तत्व मौजूद होते हैं जैसे कि विटामिन सी विटामिन बी जो प्रोस्टेट कैंसर को होने से रोकते हैं|

2.ब्रोकली– ब्रोकली के अंकुर मे पाया जाने वाला फाइटोकेमिकल्स कैंसर के कीटाणुओं से लड़ने में हमारी मदद करता है इसलिए प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित व्यक्ति को ब्रोकली का सेवन करना चाहिए|

ब्रोकली
ब्रोकली

3.अमरूद– अमरूद मे लाइकोपिन नामक पदार्थ पाया जाता है जो कैंसर से लड़ने में हमारी मदद करता है|

4.सोयाबीन– प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित व्यक्ति को प्रतिदिन अपने आहार में सोयाबीन का सेवन करना चाहिए|

5.एलोवेरा– एलोवेरा में कुछ ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो कैंसर की कोशिकाओं को बढ़ने से रोकते हैं इसलिए प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित व्यक्ति को प्रतिदिन एलोवेरा का सेवन करना चाहिए|

Alovera
एलोवेरा ( Alovera )

6.ग्रीन टी-प्रतिदिन ग्रीन टी का सेवन करने से हम कैंसर होने से बच सकते हैं|

7.अंगूर– अंगूर में पोरंथोसाइनिडीसभरपूर मात्रा में पाया जाता है जिससे ट्रोजन के निर्माण में कमी होती है और हमें कैंसर रोग से निजात मिलता है|                                                                                                              

बुलिमिया नर्वोसा (bulimia nervosa)

बुलिमिया नर्वोसा (bulimia nervosa)

बुलिमिया नर्वोसा

बुलिमिया नर्वोसा एक तरह का ईटिंग डिसऑर्डर है| इस रोग के होने पर व्यक्ति जरूरत से ज्यादा खाना खाने लगता है और खाने को उल्टी के माध्यम से निकालने का पर्यतन करता है जिसके कारण पाचन तंत्र पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है|व्यक्ति अपने वजन को लेकर चिंतित रहते हैं| कैलोरीज घटाने के लिए उल्टियां करते हैं| बुलिमिया नर्वोसा डिसऑर्डर किशोरावस्था में अधिक देखने को मिलता है पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में बुलिमिया नर्वोसा डिसऑर्डर होने की ज्यादा संभावना होती है|

बुलिमिया नर्वोसा के लक्षण (bulimia nervosa symptoms)

  • जरूरत से ज्यादा खाना खाना
  • मासिक धर्म का अनियमित होना
  • कैलोरी घटाने के लिए उल्टियां करते रहना
  • थकान का अनुभव होना
  • वजन को लेकर चिंतित रहना
  • बार बार पेशाब करना
  • हृदय की धड़कन का अनियमित होना
  • आंखों की रक्त वाहिकाओं का टूट जाना
  • डिहाइड्रेशन की समस्या होना
  • अवसाद

बुलिमिया नर्वोसा के कारण (causes of bulimia nervosa )

  1. आत्मविश्वास में कमी होना– आत्मविश्वास में कमी होने के कारण बुलिमिया नर्वोसा की समस्या उत्पन्न हो जाती है|
  2. अनुवांशिकता- अगर आपके किसी परिवार के सदस्य को बुलिमिया नर्वोसा ईटिंग डिसऑर्डर है तो आपको यह रोग होने की संभावना हो सकती है|
  3. मानसिक विकार– मानसिक विकार के कारण भी आपको ज्यादा भूख लगने लगती है जो बुलिमिया नर्वोसा का कारण बनती है|

खाना खाने के विकार (binge eating disorder)

खाना खाने के विकार को बिंज ईटिंग डिसऑर्डर कहते हैं इसमें व्यक्ति शुरू से ज्यादा खाना खाते हैं और खुद पर नियंत्रण नहीं कर पाते अभी खाना खाने के बाद आप पेट भरा हुआ महसूस करते हैं और वजन बढ़ने के डर से जड़ी बूटियों का प्रयोग कर उल्टियां करते हैं व खुद को बीमार कर लेते हैं| बिंज ईटिंग डिसऑर्डर किशोरावस्था में लोगों को होने लगता है| पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को बिंज ईटिंग डिसऑर्डर होने की संभावना ज्यादा होती है| महिलाओं में किसी बात को लेकर चिंता तनाव डिप्रेशन होने पर बिंज ईटिंग की समस्या उत्पन्न होती है इसी व्यक्ति वजन को लेकर चिंतित रहता है|

बिंज ईटिंग डिसऑर्डर के लक्षण (binge eating disorder symptoms)

  • जरूरत से ज्यादा खाना खाना
  • भूख न होने पर भी भोजन करना
  • मांसपेशियों का कमजोर होना
  • थकान और कमजोरी का अनुभव होना
  • कब्ज होना
  • धूम्रपान का सेवन करने से लीवर संबंधित समस्या होना
  • यौन संबंध में रुचि न रखना
  • उल्टी होने पर गर्भधारण करने में असमर्थ होना
  • गुर्दों में हानि पहुंचना
  • दिल की धड़कन का असामान्य होना
  • पेट में दर्द जलन होना

बुलिमिया नर्वोसा से बचने के लिए आयुर्वेदिक उपाय ( bulimia nervosa treatment)

  1. इलायची– इलायची का सेवन करने से बुलिमिया नर्वोसा यानी भूख की कमी को दूर किया जा सकता है खाने में इलायची का सेवन करने से भूख को बढ़ाया जा सकता है|
  2. अदरक- अदरक में एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं खाना खाने से पहले अदरक के छोटे टुकड़े को काला नमक और नींबू लगाकर खाने से मुंह में पाए जाने वाले टेस्ट बड्स को सहायता मिलती है यह पाचन क्रिया के लिए भी सहायक है|
  3. ग्रीन टी- ग्रीन टी का सेवन करने से वह को बढ़ाने में मदद मिलती है ग्रीन टी का सेवन करने से तनाव चिंता और थकान को दूर किया जा सकता है|
  4. संतरा- संतरे का जूस पीने से भूख बढ़ने में सहायता मिलती है संत्री पाचन तंत्र को भी बढ़ावा देने में हमारी सहायता करते हैं और संतरे के छिलकों के गंध से डिप्रेशन तनाव को कम करने में मदद मिलती है|
  5. मिंट- प्रतिदिन मिंट टी का सेवन करने से भूख को बढ़ाया जा सकता है और यह भावनात्मक तनाव को दूर करने में भी सहायक है|
  6. पुदीना- अपनी प्रतिदिन के आहार में पुदीने को शामिल करना चाहिए पूरी ना भूख को बढ़ाने में भी सहायक है और तनाव को कम करता है|
  7. लहसुन- एक कप पानी में चार से पांच कलियां लहसुन की उबालें इसका प्रतिदिन सेवन करने से भूख बढ़ने में मदद मिलती है|
लहसुन
लहसुन

एनोरेक्सिया नर्वोसा

एनोरेक्सिया नर्वोसा (anorexia nervosa)

एनोरेक्सिया नर्वोसा

एनोरेक्सिया नर्वोसा एक ऐसी मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपना वजन बढ़ाने से डरता है| इस रोग में व्यक्ति अपने वजन को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंतित रहता है उन्हें हर समय यही डर लगा रहता है कि उनका वजन बढ़ न जाए| एनोरेक्सिया नर्वोसा एक ईटिंग डिसऑर्डर बीमारी है जिसमें व्यक्ति कम से कम खाते हैं और कैलोरी बढ़ाने के लिए अधिक व्यायाम करते हैं|यह मानसिक बीमारी युवावस्था के लोगों में भी देखने को मिलती है लेकिन बच्चों में इस मानसिक बीमारी के होने पर बच्चों की मन में खाने और वजन के प्रति असामान्य विचार आने लगते हैं|जिन व्यक्तियों में एनोरेक्सिया नर्वोसा ईटिंग डिसऑर्डर नामक बीमारी होती है  भूख लगने पर भी वजन बढ़ने के डर से खाना खाने से मना कर देते हैं खाने से दूर भागते हैं|

एनोरेक्सिया नर्वोसा के लक्षण (anorexia nervosa symptoms)

  • व्यक्ति अपने वजन को लेकर अधिक चिंतित रहते हैं
  • कैलोरीज बढ़ाने के लिए कई प्रकार के एक्सरसाइज करते हैं
  • वजन कम होने पर भी वजन कम करने का प्रयास करते हैं
  • अचानक वजन कम होना
  • खाने की आदतों में बदलाव आना
  • यौन संबंध में रुचि न रखना
  • पीरियड्स का सही समय पर न आना  का मुख्य लक्षण माना जाता है
  • एनोरेक्सिया नर्वोसा की समस्या होने पर व्यक्ति नियमित रूप से अपना वजन जागता  रहता है
  • खाना न खाने से पोषक तत्वों की कमी के के कारण अचानक वजन कम होने लगता है
  • थकान का अनुभव होना
  • पोषक तत्वों की कमी के कारण चेहरे का पीलापन नजरआना
  • बालों का तेजी से झड़ना
  • वजन कम करने के लिए धूम्रपान करना

एनोरेक्सिया नर्वोसा के कारण (causes of anorexia nervosa)

  1. मनोवैज्ञानिक कारण- युवाओं में खाने की भूख होने के बाद भी वजन बढ़ने के डर से भोजन न करना मनोवैज्ञानिक लक्षण होते हैं वजन कम होने पर भी वजन कम करने का प्रयास करते रहना वजन की प्रति चिंतित रहना आदि मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं|
  2. जैविक कारण-आनुवंशिक परिवर्तन के कारण भी कम खाना खाने यानी एनोरेक्सिया का विकास होने की संभावना बढ़ जाती है|
  3. युवा- एनोरेक्सिया नर्वोसा नामक डिसऑर्डर किशोरावस्था में अधिक देखने को मिलता है| यह 40 साल से अधिक उम्र के लोगों में पाया जाता है|
  4. अनुवांशिकता- अगर आपके किसी परिवार के सदस्य को एनोरेक्सिया नर्वोसा ईटिंग डिसऑर्डर है तो आपको यह रोग होने की संभावना हो सकती है|
  5. जेनेटिक्स कारण- जीन में परिवर्तन होने पर एनोरेक्सिया नर्वोसा होने का खतरा बना रहता है|

एनोरेक्सिया नर्वोसा से बचने के लिए आयुर्वेदिक उपाय (anorexia nervosa treatment)

  1. अदरक- अदरक में एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं खाना खाने से पहले अदरक के छोटे टुकड़े को काला नमक और नींबू लगाकर खाने से मुंह में पाए जाने वाले टेस्ट बड्स को सहायता मिलती है यह पाचन क्रिया के लिए भी सहायक है|
  2. संतरा- संतरे का जूस पीने से भूख बढ़ने में सहायता मिलती है संतरे पाचन तंत्र को भी बढ़ावा देने में हमारी सहायता करते हैं और संतरे के छिलकों के गंध से डिप्रेशन तनाव को कम करने में मदद मिलती है|
  3. लहसुन- एक कप पानी में चार से पांच कलियां लहसुन की उबालें इसका प्रतिदिन सेवन करने से भूख बढ़ने में मदद मिलती है|
  4. मिंट टी- प्रतिदिन मिंट टी का सेवन करने से भूख को बढ़ाया जा सकता है और यह भावनात्मक तनाव को दूर करने में भी सहायक है|
  5. ग्रीन टी- ग्रीन टी का सेवन करने से वह को बढ़ाने में मदद मिलती है ग्रीन टी का सेवन करने से तनाव चिंता और थकान को दूर किया जा सकता है|
  6. पुदीना- अपनी प्रतिदिन के आहार में पुदीने को शामिल करना चाहिए पूरी ना भूख को बढ़ाने में भी सहायक है और तनाव को कम करता है|
  7. इलायची– इलायची का सेवन करने से एनोरेक्सिया नर्वोसा यानी भूख की कमी को दूर किया जा सकता है खाने में इलायची का सेवन करने से भूख को बढ़ाया जा सकता है|
अदरक
अदरक

काली खांसी

काली खांसी

आइए, पहले यह जानते हैं कि बच्चों को खांसी होने के पीछे मुख्य वजह क्या है।जब किसी अवरोध के कारण वायुमार्ग बंद होने लगता है, तो खांसने से यह अवरोध हटता है और गले को राहत पहुंचती है। खांसी किसी भी हानिकारक पदार्थ जैसे धूल या खाद्य कणों को साफ करने में मदद करती है, जो किसी वजह से सांस केसाथ अंदर चले जाते हैं। यह श्वसन तंत्र के अतिरिक्त स्राव जैसे बलगम को भी दूर करने में मदद करता है। जब स्राव होता है, तो इसे गीली खांसी के रूप में जाना जाता है, वर्ना इसे सूखी खांसी कहा जाता है।

काली खांसी के लक्षण

काली खांसी एक खतरनाक बीमारी है क्योंकि ये संक्रामक होती है यानि इस बीमारी के वायरस हवा के जरिये एक इंसान से दूसरे तक पहुंचते हैं। इस रोग का कारण हिमोफाइलस परटुसिस नाम के जीवाणु होते हैं। ये जीवाणु रोगी को छूने, साथ खाने और उसकी खांसी के संपर्क में आने से आपको भी हो सकता है। तो आइये आज हम आपको बताते है इस बीमारी से जुड़े लक्षण और इसके उपचार के बारे में।

  • काली खांसी में रोगी को लगातार जोर-जोर से खांसी आती है। खांसते-खांसते रोगी को कई बार उल्टी भी होने लगतीहै और सीने में तेज जलन महसूस होने लगती है।थोड़ी-थोड़ी देर पर खांसी आती ही रहती है इसलिए रोगी का हाल बुरा हो जाता है और उसकी सांस रुकने लगती है। कई बार इस तरह की खांसियों के कुछ और कारण भी हो सकते हैं जैसे टीबी, दमा, फेफड़ों का संक्रमण, अस्थमा आदि। इसलिए इस प्रकार की खांसी होने पर डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है ताकि आप खांसी का कारण जान सकें।

काली खांसी होने का कारण

बच्चों को खांसी होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। नीचे हम नवजात शिशुओं और बच्चों में होने वाली खांसी के 10 कारण बता रहे हैं :

  1. सामान्य खांसी: यह आम खांसी होती है और जब ठीक होने लगती है, तो सूखी खांसी रूप लेकर खत्म हो जाती है। सामान्य खांसी के लिए कई वायरस जिम्मेदार होते हैं, जिनमें राइनोवायरस सबसे आम है।
  2. काली खांसी: इसमें खांसी के साथ बलगम भी निकलता है। इसी के साथ लंबी सांस लेते समय आवाज भीआती है। बोर्डेटेला पर्टुसिस बैक्टीरिया के कारण काली खांसी होती है, जोकभी कुछ दिन, तो कभी महीनों तक बनी रहती है।
  3. क्रुप: यह वायुमार्ग में सूजन आने के कारण होने वाली खांसी है। इस वजह से बच्चे को सांस लेने में तकलीफ होती है।
  4. लंग या साइनस संक्रमण: फेफड़ों के संक्रमण से फेफड़ों में कफ बनने लगता है, जिससे गीली खांसी होती है। वहीं, साइनस इन्फेक्शन से भी कफ बनता है और गले में आने लगता है। फेफड़ों में संक्रमण होने के निम्न कारण हो सकते हैं :शिशुओं और बच्चों को होने वाले फेफड़े के संक्रमण को ब्रोंकियोलाइटिस कहते हैं, जिससे फेफड़ों के अंदर छोटे वायुमार्ग संक्रमित हो जाते हैं।ब्रोंकियोलाइटिस का सबसे आम कारण रेस्पिरेटरी सिंसिशीयल वायरस (आरएसवी) है|कई वायरस और बैक्टीरिया साइनस के संक्रमण का कारण बन सकते हैं। जब संक्रमित स्राव नाक से गले तक जाता है (पोस्ट-नेसल ड्रिप), तो वो गले में जलन पैदाकरते हैं और खांसी होती है।
  5. एलर्जी :बच्चे को एलर्जी होने पर भी खांसी की समस्या हो सकती है। अधिकतर बच्चों को धूल-मिट्टी से एलर्जी होती है, जिस कारण खांसी हो सकती है।
  6. अस्थमा :अस्थमा भी खांसी का एक कारण हो सकता है। इसमें छाती में भारीपन महसूस होता है और सांस लेने में तकलीफ होती है।
  7. टीबी :टीबी की बीमारी भी खांसी का मुख्य कारण हो सकती है। अगर लंबे समय से खांसीहो रही है और इलाज के बाद भी ठीक नहीं हो रही है, तो यह टीबी का संकेत होसकता है।
  8. गैस्ट्रोएसोफेगल रिफ्लक्स :इसके कारण होने वालीखांसी गीली होगी, लेकिन इसमें बलगम नहीं बनता। गैस्ट्रोएसोफेगल रिफ्लक्स के कारण खांसी तब होती है, जब पेट का एसिड भोजन नलिका में पहुंचकर गले मेंजाता है। ऐसे में बच्चे को डकार और हिचकियों की समस्या हो सकती है।
  9. सिस्टिक फाइब्रोसिस :इस कारण लगातार खांसी होती है, जिसमें काफी सारा बलगम बाहर आता है जो टिशू बलगम, पसीना और पाचन रस बनाते हैं, सिस्टिक फाइब्रोसिस से इन्हें नुकसान पहुंचता है।
  10. एस्पिरेशन :यह कुछ भी खाने या पीनी के बाद अचानक से होने वाली खांसी है। इसके अलावा, अगर बच्चे के गले में कुछ फस जाए, तो भी ऐसी खांसी हो सकती है।

काली खांसी को जड़ से खत्म करने के आयुर्वेदिक नुस्खे

  1. तुलसी के पत्ते –तुलसी के पत्ते भी खांसी-जुकाम में बहुत फायदेमंद होते हैं। काली खांसी से राहत के लिए तुलसी के पत्तों और काली मिर्च को बराबर मात्रा में पीस लें। इस मिश्रण की छोटी-छोटी गोलियां बना लें और इसे दिन में तीन बार चूसें। ये छोटी गोलियां आपकी खांसी को मिटाकर आपका गला साफ कर देंगी।
  2. लहसुन –लहसुन सर्दी, जुकाम और खांसी तीनों के इलाज के लिए अच्छा माना जाता है क्योंकि इसकी तासीर गर्म होती है। रोजाना खाने में लहसुन के प्रयोग से आप इन रोगों से दूर रह सकते हैं।काली खांसी से छुटकारे के लिए लहसुन की 5-6 कलियों को छीलकर बारीक काट लें औरउन्हें पानी में डालकर उबाल लें। अब इस पानी से भाप लें। रोज ऐसा करने से 8-10 दिन में काली खांसी जड़ से खत्म हो जाती है।
  3. बादाम- बादाम भी काली खांसी के इलाज में कारगर है।बच्चों की काली खांसी में तीन-चार बादाम रात को पानी में भिगाकर रख दें। सुबह बादाम के छिलके उतार लें और इसे एक कली लहसुन और थोड़ी सी मिश्री के साथ पीस लें। अब इस पेस्ट की छोटी-छोटी गोलियां बनाकर बच्चे को खिलाएं। इससे खांसी में आराम मिलेगा।
  4. शहद-शहद भी सर्दी–खांसी ठीक करने के उपाय के रूप में अपनाया जा सकता है। एक वर्ष से ऊपर के बच्चों को आधा चम्मच शहद दूध में मिलाकर दिन में दो बार दिया जा सकता है।
  5. नींबू-विटामिन सी से भरपूर होने के कारण नींबू शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाने में भी सहायक होता है। नींबू के रस में थोड़ा सा शहद और बहुत सारा पानी मिलकर अगर एक वर्ष से ऊपर के बच्चों को पिलाया जाये तो उससे छोटे बच्चों को सर्दी–खांसी में बहुत आराम आएगा।
  6. दालचीनी-दालचीनी एक प्रभावशाली एंटी बैक्टीरिया, एंटीऑक्सीडेंट और एंटी बैक्टीरिया के गुणों से भरपूर होने के कारण बहुत फायदेकी चीज है। एक वर्ष से ऊपर के बच्चों को यह बहुत आराम से दी जा सकती है। एक चम्मच शहद में ¼ चम्मच दालचीनी का पाउडर मिलाकर बच्चे को हर चार घंटे के अंतराल पर दें। जैसे ही सर्दी खांसी की शुरुआत हो तो यह मिक्स्चर देने से तुरंत आराम आ जाता है। 
  7. हल्दी-नवजात शिशुओं के लिए इस उपाय के रूप में सूखी हल्दी का एक छोटा टुकड़ा ले लें औरइसे मोमबत्ती या फिर छोटे दिये की लौ में हल्का सा जला दें। इसके बाद बच्चे को इस जली हुई हल्दी के धुएँ को एक मिनट तक सुंघाएँ । घबराएँ नहीं, यहधुआँ एक पतले धागे की तरह होता है इसलिए बच्चे को इससे कोई खतरा नहीं होगा। याद रखें की दो वर्ष से ऊपर के बच्चों को थोड़ी सी हल्दी दूध में मिलाकर भी दी जा सकती है।बच्चों की सर्दी खांसी ठीक करने का यह एक अच्छा उपाय है।
  8. विक्स वेपोरब-ठीक करने के लिए विक्स एक बहुत अच्छा उपाय है । बच्चे के पाँव में इसकी मालिश करके उसे मोज़े पहना दें। अगर चाहें तो इसकी मालिश छाती और गले पर भी कर दें।
  9. भाप दें-बहुत बच्चों को कभी भी भाप उस तरह नहीं दी जाती है जैसे हम वयस्क व्यक्ति कोदेते हैं। इसके लिए आप कमरे में के बाल्टी या बाथरूम में बाथटब गरम पानी से भर लें। ऐसे में छोटे बच्चे को अपनी बाँहों में लेकर भाप के वातावरण मेंखड़े हो जाएँ । इससे छाती में जमा बलगम आसानी से ढीला पड़ सकता है ।नन्हें बच्चों की सर्दी–खांसी में इससे बहुत जल्दी आराम आने की संभावना होती है।
हल्दी
हल्दी

डार्क प्राइवेट पार्ट्स

डार्क प्राइवेट पार्ट्स

महिलाओं को यह समझने की जरूरत है कि उनकी योनि काले या बदलते रंग बिल्कुल स्वाभाविक है, अधिकांश भाग के लिए। योनि की त्वचा का रंग महिला से महिला में भिन्न होता है। यह गुलाबी, लाल से लेकर बरगंडी तक कई अलग तरह के शेड्स हो सकते हैं। कुछ महिलाएं इस बारे में चिंता करती हैं कि क्या योनि काली हो जाती है, इसे खराब स्वच्छता या संक्रमण से जोड़ते हैं। ज्यादातर मामलों में, योनि की त्वचा का यह काला पड़ना पूरी तरह से सामान्य है|डार्क प्राइवेट पार्ट्स जैसे योनि की त्वचा का रंग न केवल महिला से भिन्न हो सकता है, बल्कि कई अलग-अलग कारकों के आधार पर बदल सकता है|

डार्क प्राइवेट पार्ट्स के कारण

यह एक तथ्य है कि आपके निपल्स, अंडर आर्म्स, योनि और आंतरिक जांघ क्षेत्र आपके शरीर के बाकी हिस्सों की तुलना में गहरे रंग के होने की संभावना है। जबकि कुछ महिलाओं को लगता है कि नियमित शेविंग (अंडरआर्म्स और योनि क्षेत्र) इसका कारण है, या वेंटिलेशन – आपके निजी क्षेत्र ज्यादातर समय सीमित होते हैं, ताजी हवा प्राप्त नहीं करते हैं। यह निश्चित रूप से त्वचा की बनावट और रंग को बदलता है।

  1. नमी – कारावास के कारण, आपके निजी क्षेत्र बहुत अधिक नमी जमा करते हैं, जिससे त्वचा का रंग बदल सकता है।
  2. रेजर- रेजर का प्रयोग कर्ते रह्ने से योनी मे कालेपन की सम्स्या आ जाती है और योनी मे सूखापन आ जाता है|
  3. पसीना – पसीना आपके शरीर के भीतर से बेकार है। इसमें आपके शरीर से अलग-अलग रसायन होते हैं। क्योंकि आपके निजी क्षेत्र अधिकतर समय सीमित होते हैं, कोई भी हल्का पसीना त्वचा पर तब तक रहता है जब तक आप स्नान नहीं करते। इससे त्वचा का रंग बदल जाता है।
  4. ब्लीच क्रीम- योनी पर ब्लीच क्रीम का निरंतर प्र्योग करते रह्ने से योनी मे त्व्चा का रंग गहरा हो जाता है|
  5. चुस्त कपड़े – तंग कपड़ों में अपने निजी क्षेत्रों को सीमित करने से त्वचा को सांस लेने से रोका जाता है, जिससे त्वचा का रंग गहरा होता है।
  6. त्वचा की सतहों के बीच निरंतर घर्षण आपके निजी क्षेत्रों की बनावट और रंग को बदल देता है।
  7. उम्र – उम्र के बढ्ने के साथ -2 आपके निजी क्षेत्र स्वाभाविक रूप से काले हो जाते हैं। यह हार्मोनल परिवर्तनों के लिए जिम्मेदार है।
  8. आनुवांशिकी – आपको ऐसे जीन विरासत में मिल सकते हैं जो आपके निजी क्षेत्रों में गहरे रंग की त्वचा का कारण बनते हैं।
  9. गर्भावस्था – जबकि आपके निजी क्षेत्रों में गहरे रंग की त्वचा नहीं हो सकती है, आप गर्भावस्था के दौरान भी इसका विकास कर सकते हैं।
  10. हार्मोनल असंतुलन-एस्ट्रोजन एक हार्मोन्स है जो कि यौनी के ऊत्तकों को स्वस्थ रखने का काम करता है। यह हार्मोन्स यौनी में लुब्रिकेंट, एसिडिटी लेवल और इलास्टिसिटी को बनाए रखने में मदद करता है। लेकिन जब एस्ट्रोजन के लेवल में कमी आती है तो यौनी में लुब्रिकेंट की कमी, यौनी में ढीलापन जैसी परेशानियां होने लगती है|

योनी के रंग को प्राक्रतिक तरीके से गोरा बनाने के घरेलू उपाय

  1. नींबू का रस और शहद का उपयोग- नींबू में सिट्रस एसिड और विटामिन सी होता है तो कि रंग को साफ करने में सहायक होता है। 1 चम्‍मच नींबू के रस में कुछ बूंद शहद की मिलाएं और इस घोल में रूई भिगो कर प्रभावित जगह पर लगाएं। 5 मिनट के बाद पानी से धो लें। ऐसा दिन में 2 से 3 बार करें। इसके साथ ही आप अकेले नींबू को ल्गाकर योनी के रंग को गोरा कर सक्ते है|
  2. एलोवेरा का उपयोग-इस्का उप्योग कर्के आप योनी के रंग को गोरा कर सकते है| एलोवेरा में एंटीऑक्‍सीडेंट होते हैं जो स्‍किन के कलर को हल्‍का बनाते हैं। एक चुटकी हल्‍दी में 1 चम्‍मच एलोवेरा मिलाएं और इससे प्रभावित जगह को साफ करें। फिर इसे तौलिये से पोछ लें और 30 मिनट तक ऐसे ही रहने दें। फिर इसे धो कर इस विधि को 2 से 3 बार दिन में करें। इसके आलावा आप एलोवेरा का गुदा निकलकर अपनी योनी/vagina पर मसाज कर्के सूखने के बाद धो ले|
  3. नारियल तेल का उपयोग –नारियल का तेल एंटीसेप्‍टिक, एंटी बैक्‍टीरियल और एंटी फंगल गुणों से भरा होता है। इससे पिगमेंटेशन और कई तरह के स्‍किन इंफेक्‍शन दूर होते हैं। अपने पाइवेट पार्ट को साफ कर लें और फिर वहां पर इस तेल को लगाएं। इसके साथ ही तेल को अच्‍छी तरह से स्‍किन में समा जाने दीजिये। अच्‍छा रिजल्‍ट पाने के लिये नारियल के तेल का प्रयोग रोजाना कीजिये। आप  का प्रयोग रोजाना कीजिये। आप नारियल के तेल से हलके हाथो से योनी/vagina पर मसाज कर्ने से जरुर लाभ प्राप्त होगा|
  4. आलू के रस का प्रयोग-आलू के रस का प्रयोग योनि के रंग को निखारने में हमारी मदद करता है इसका प्रयोग करने के लिए आलू को अच्छी तरह पीसकर उसका रस निकाल कर फिर अपनी योनि पर अच्छी तरह लगाकर मसाज कीजिए इसका नियमित प्रयोग करने से आपकी योनि का रंग साफ हो जाएगा|
  5. अंडे का सफेद हिस्‍सा-अंडे के सफेद हिस्से में प्रोटीन नामक पदार्थ होता है जो कि स्किन को गोरा करता है अंडे का सफेद हिस्सा एक कटोरी में लेकर अच्छी तरह से फेंट लें। बाद में इसे अपनी स्‍किन पर लगाएं और जब वह सूख जाए तब उसे कॉटन की मदद से पोंछ लें।
एलोवेरा
एलोवेरा

योनि के सूखापन होने के लक्षण

  1. योनि में जलन होना
  2. योनि में ढीलापन आ जाना

योनि के सुखापन होने के कारण

यौनी में सुखापन होने के कई कारण होते हैं। जैसे हार्मोनल परिवर्तन, मनोवैज्ञानिक परिवर्तन आदि।

  1. योनी में जलन-योनि में सूखापन होने से कई महिलाओं को योनि में जलन की समस्या उत्पन्न हो जाती है इसके मुख्य कारण है साबुन डे परफ्यूम आदि से एलर्जी हो जाती है|
  2. दवाओं के इस्तेमाल से-यदि आप महिलाएं वेजाइनल क्लीनजर का उपयोग करती है तो क्लींजर की वजह से भी योनि में सूखापन आ जाता है|
  3. चिंता और तनाव- चिंता और तनाव की वजह से महिलाओं की योनि में रक्त का प्रवाह सही तरह से नहीं हो पाता और योनि में लुब्रिकेंट की कमी आ जाती है|
  4. अपर्याप्त कामोत्तेजना- अपर्याप्त कामोत्तेजना यानी पुरुष का स्त्री के साथ कम संभोग का प्रदर्शन भी योनि में सूखे पन  का कारण बन सकता है|
  5. हारमोंस में परिवर्तन- एस्ट्रोजन नामक हार्मोन योनि के ऊतकों को स्वस्थ रखने का कार्य करता है यह योनि में एसिडिटी लेवल को बनाए रखता है जब एस्ट्रोजन के लेवल में कमी आ जाती है तो योनि में ढीलापन जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं|

योनि के सूखापन को दूर करने के लिए कुछ आयुर्वेदिक उपचार

  1. एलोवेरा जेल के साथ केसर और अश्वगंधा दूध को बराबर मात्रा में मिलाएं और इसका सेवन करें इससे यह समस्या दूर हो जाएगी|
  2. शरीर में पानी की कमी के कारण भी होनी में सूखा बना जाता है इसलिए दिन में दो से 3 लीटर पानी पीना जरूरी है|
 

ईटिंग डिसऑर्डर (eating disorders)

ईटिंग डिसऑर्डर (eating disorders)

ईटिंग डिसऑर्डर

ईटिंग डिसऑर्डर को खानपान के विकार (eating disorder) की बीमारी भी कहा जाता है अभी खाना खाने पर वजन बढ़ने के डर से जड़ी बूटियों का प्रयोग करने पर जो हमारे स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है उसे ईटिंग डिसऑर्डर(eating disorder) कहते हैं|इसके अंतर्गत निम्नलिखित बातें आती है जैसे-अधिक खाना और बहुत कम खाना व कैलोरीज घटाने के लिए आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों का प्रयोग करना ईटिंग डिसऑर्डर की समस्या  किशोरावस्था में होती है|यह लड़कों और पुरुषों की अपेक्षा लड़कियों और महिलाओं में अधिक देखने को मिलती है| ईटिंग डिसऑर्डर(eating disorder) होने की कोई उम्र नहीं होती यह किसी भी उम्र के लोगों को हो सकता है| यह 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगो में अधिक पाया जाता है जो लोग बचपन में मोटापे से पीड़ित होते हैं उनमें ईटिंग डिसऑर्डर होने की संभावना ज्यादा होती है|ईटिंग डिसऑर्डर से ग्रस्त लोग कैलोरीज घटाने के लिए एक्सरसाइजेज या व्यायाम करते हैं| कई लोग वजन कम करने के लिए धूम्रपान का सेवन करते हैं|इसके दो मुख्य प्रकार होते हैं:

  1. एनोरेक्सिया नर्वोसा(anorexia nervosa)
  2. बुलिमिया नर्वोसा(bulimia nervosa)

ईटिंग डिसऑर्डर के दोनों प्रकारों एनोरेक्सिया नर्वोसा (anorexia nervosa) व बुलिमिया नर्वोसा (bulimia nervosa)में एक जैसे लक्षण नजर आते हैं शुरुआत में व्यक्ति को एनोरेक्सिया के लक्षण नजर आते हैं और उसके बाद बुलिमिया के लक्षणों में बदल जाते हैं|

ईटिंग डिसऑर्डर के लक्षण (eating disorder symptoms)

  • खाना न खाने के लिए बहाने बनाना
  • वजन कम होने पर भी वजन कम करने का प्रयास करना
  • खाना खाने के बाद बार-बार शौच जाना
  • वजन को लेकर चिंतित रहना
  • जरूरत से ज्यादा खाने के बाद पेट भरा हुआ पेट महसूस होना और जड़ी बूटियों का प्रयोग करके उल्टियां करना व खुद की तबीयत खराब करना और शर्मिंदगी महसूस करना
  • एनोरेक्सिया से पीड़ित लोग वजन कम करने के लिए अधिक व्यायाम करते हैं और कई प्रकार की एक्सरसाइज करते हैं कम से कम खाना खाते हैं और भूख लगने पर भी खाना नहीं खाने के बहाने बनाते हैं
  • बुलिमिया नर्वोसा से ग्रस्त लोग कैलोरी घटाने के लिए जड़ी बूटियों का प्रयोग करके उल्टियां करते हैं और खुद की तबीयत खराब कर लेते हैं
  • जरूरत से ज्यादा खाना खाने पर व्यक्ति शर्मिंदगी महसूस करने लगता है
  • थकान का अनुभव होता है
  • आप अपने आप को दोषी महसूस करते हैं

ईटिंग डिसऑर्डर के कारण (cause of eating disorder)

  1. अनुवांशिकता– आपके परिवार में से किसी सदस्य माता-पिता में भोजन विकास संबंधी समस्या है तो आप में भी यह समस्या विकसित होने की संभावना बढ़ने लगती है|
  2. तनाव- एनोरेक्सिया से ग्रस्त लोग वजन बढ़ने के डर से चिंतित रहते हैं और खाना खाने पर जड़ी बूटियों के प्रयोग से उल्टियां करते हैं और शर्मिंदगी महसूस करते हैं|
  3. मानसिक कारण- खाने की विकार से पीड़ित लोगों को मानसिक समस्याएं होने लगती है जो खाने के विकार को विकसित करती हैं|
  4. युवा- ईटिंग डिसऑर्डर की समस्या किशोरा अवस्था में ही देखने को मिलती है पुरुषों की अपेक्षा यह समस्या महिलाओं में अधिक देखने को मिलती है|
  5. हीन भावना- एनोरेक्सिया और बुलिमिया ईटिंग डिसऑर्डर से पीड़ित लोग दूसरों की तुलना में अपने आप को कमजोर महसूस करते हैं और वजन बढ़ने की भावनाओं को विकसित करते हैं|
  6. शारीरिक कारण- ईटिंग डिसऑर्डर पुरुषों में अधिक देखने को मिलता है यह उन व्यवस्याओं में अधिक देखने को मिलता है जहां कम वजन की मांग होती है|
  7. भोजन की कमी होना या डाइटिंग– खाना कम खाना खाने की विकार को विकसित करने वाला मुख्य कारण है खाने की कमी के कारण तनाव, चिंता डिप्रेशन कम भूख लगना जैसी समस्याएं उतपन होने लग जाती है जिसके कारण व्यक्ति एनोरेक्सिया से पीड़ित हो जाता है|

ईटिंग डिसऑर्डर से बचने के लिए आयुर्वेदिक उपाय (eating disorder treatment)

  1. अदरक- अदरक में एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं| खाना खाने से पहले अदरक के छोटे टुकड़े को काला नमक और नींबू लगाकर खाने से मुंह में पाए जाने वाले टेस्ट बड्स को सहायता मिलती है यह पाचन क्रिया के लिए भी सहायक है|
  2. संतरा- संतरे का जूस पीने से भूख बढ़ने में सहायता मिलती है| संतरे पाचन तंत्र को भी बढ़ावा देने में हमारी सहायता करते हैं और संतरे के छिलकों के गंध से डिप्रेशन तनाव को कम करने में मदद मिलती है|
  3. लहसुन- एक कप पानी में चार से पांच कलियां लहसुन की उबालें इसका प्रतिदिन सेवन करने से भूख बढ़ने में मदद मिलती है|
  4. मिंट टी- प्रतिदिन मिंट टी का सेवन करने से भूख को बढ़ाया जा सकता है और यह भावनात्मक तनाव को दूर करने में भी सहायक है|
  5. ग्रीन टी- ग्रीन टी का सेवन करने से वह को बढ़ाने में मदद मिलती है ग्रीन टी का सेवन करने से तनाव चिंता और थकान को दूर किया जा सकता है|
  6. पुदीना- अपनी प्रतिदिन के आहार में पुदीने को शामिल करना चाहिए पूरी ना भूख को बढ़ाने में भी सहायक है और तनाव को कम करता है|
  7. इलायची– इलायची का सेवन करने से एनोरेक्सिया नर्वोसा यानी भूख की कमी को दूर किया जा सकता है खाने में इलायची का सेवन करने से भूख को बढ़ाया जा सकता है|
इलायची
इलायची

डिमेंशिया (मनोभ्रंश)

डिमेंशिया (मनोभ्रंश)

डिमेंशिया

डिमेंशिया (Dementia) किसी विशेष बीमारी का नाम नहीं, बल्कि के लक्षणों के समूह का नाम है, जो मस्तिष्क की हानि से सम्बंधित है|लोग डिमेंशिया को सिर्फ एक भूलने की बीमारी के नाम से जानते हैं यह मुख्यत याददाश्त की समस्या है| डिमेंशिया के लक्षण चिंताजनक होते हैं जो कई रोगों के कारण पैदा होते हैं| यह सभी लोग मस्तिष्क को हानि पहुंचाते हैं क्योंकि हम सभी कामों के लिए अपने मस्तिष्क पर निर्भर है|अधिवेशन से पीड़ित व्यक्ति अपने दैनिक कार्य ठीक ढंग से नहीं कर पाते हैं| कभी-कभी वे यह भी भूल जाते हैं कि वह किस शहर में है ,कौन सा साल महीना चल रहा है| डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है और व्यक्ति की स्थिति खराब हो जाती है| बढ़ती उम्र के चलते उन्हें काम में भी दिक्कत आने लगती है जैसे -चल पाना , बात करना , ठीक ढंग से खाना-पीना छोटी चीजों के लिए दूसरों पर निर्भर करते हैं|

जब डिमेंशिया के लक्षण आने शुरू हो जाते हैं तब परिवार के लोग यह नहीं समझ पाते कि व्यक्ति अजीब तरह से क्यों व्यवहार कर रहा है इसमें व्यक्ति की याददाश्त कमजोर हो जाती है और वे डिमेंशिया का शिकार हो जाता है|

डिमेंशिया
डिमेंशिया

डिमेंशिया के प्रकार (Dementia types)

  1. अल्जाइमर रोग- डिमेंशिया का सबसे आम प्रकार है|अल्जाइमर रोग इस रोग के होने के कारण व्यक्ति की मस्तिष्क की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती है जिससे व्यक्ति में मस्तिष्क का आकार घटता जाता है|
  2. मिश्रित डिमेंशिया- इसमें व्यक्ति को एक ही समय में अल्जाइमर रोग और वैस्कुलर डिमेंशिया दोनों हो सकते हैं|
  3. लेवी बॉडीज डिमेंशिया – इसमें व्यक्ति की याददाश्त में कमी , भ्रम , असंतुलन जैसी समस्याएं उत्पन्न होती है|
  4. पार्किंसंस रोग: यह वह रोग है जिसमें तंत्रिका तंत्र को क्षति पहुँचती है  जो डिमेंशिया पैदा कर सकती है|बाद में अल्जाइमर का रुप धारन कर लेती है इस बीमारी के कारण अन्य गतिविधियों में कठिनाई होने लगती है. मगर इसके कारण कुछ लोगों को डिमेंशिया भी हो जाता है|
  5. फ्रंटोटेमपोरल डिमेंशिया-यह डिमेंशिया का वह प्रकार है जिसमें व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है और व्यक्ति को बोलने में भी कठिनाई हो सकती है इसमें व्यक्ति के सोचने समझने की क्षमता भी कम हो जाती है|

डिमेंशिया के लक्षण (Dementia symptoms)

  • व्यक्ति के रोजमर्रा के कामों में भी कर आने लगती है
  • इस रोग में व्यक्ति का व्यवहार सामान्य नहीं रहता वह अजीब सा व्यवहार करने लगता है
  • जरूरी चीजें भूल जाना और याददाश्त का कमजोर होना
  • छोटी-छोटी समस्याओं को भी न सुलझा पाना
  • सोचने में कठिनाई का अनुभव होना
  • ध्यान केंद्रित न कर पाना
  • कोई भी चित्र देखकर न पहचान पाना की यह क्या है

डिमेंशिया के कारण (Dementia causes)

  1. डिमेंशिया रोग का मुख्य कारण अल्जाइमर रोग है अल्जाइमर जैसी बीमारी से मस्तिष्क क्षतिग्रस्त हो जाता है और व्यक्ति सब कामों के लिए दूसरे पर निर्भर करता है|
  2. डिमेंशिया सिर की चोट, स्ट्रोक, मस्तिष्क ट्यूमर या एचआईवी संक्रमण के कारण भी हो सकता है|
  3. मस्तिष्क की कोशिकाओं में अधिकांश परिवर्तन होता है जो डिमेंशिया का मुख्य कारण है|

डिमेंशिया के तीन चरण होते हैं प्रारंभिक ,मध्यम और अंतिम

1.प्रारंभिक-इस अवस्था में व्यक्ति के मस्तिष्क को ज्यादा हानि नहीं पहुंचती और वह अपने काम स्वयं कर लेता है इस रोग में लक्षणों पर निर्भर करता है कि व्यक्ति को डिमेंशिया किस रोग के कारण हुआ है अगर अल्जाइमर रोग है तो व्यक्ति के बोलने की क्षमता कम हो जाती है अगर फ्रंटोटेंपोरल डिमेंशिया हैं तो व्यक्ति के बोली में दिक्कत और स्वभाव में परिवर्तन आ आ जाता है इसमें व्यक्ति को पता नहीं लगता है किस रोग के लक्षण है इसलिए डॉक्टर से तुरंत ही सलाह लेनी चाहिए|

प्रारंभिक अवस्था के लक्षण

  • इसमें व्यक्ति की यादाश्त कमजोर हो जाती है और उन्हें हाल में हुई बातें याद  भी नहीं रहती
  • उनके सोचने समझने की क्षमता कम हो जाती है उन्हें बोलने में कठिनाई महसूस होती है
  • हिसाब रखने में और पैसे गिनने में दिक्कत आती है
  • ऐसे लोग चुपचाप सहमे हुए रहते हैं लोगों से मिलना पसंद नहीं करते

2.मध्य अवस्था-डिमेंशिया के बीच की अवस्था में आते आते परिवार वालों को व्यक्ति की परेशानियां यानी लक्षण नजर आने लगते हैं और व्यक्ति असमंजस में पड़ जाता है व्यक्ति के स्वभाव में बदलाव आ जाता है धीरे-धीरे उनके काम करने की क्षमता भी कम हो जाती है वह दूसरों पर निर्भर रहने लगता है ऐसे व्यक्ति अकेले रहना पसंद करते हैं|

3.अंतिम अवस्था-इस अवस्था तक पहुंचने पर डिमेंशिया से पीड़ित व्यक्ति के मस्तिष्क में बहुत हानि फैल जाती है और व्यक्ति के चलने फिरने बात करनी मैं बदलाव आ जाता है और वह लाचार हो जाते हैं वे सभी कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं ऐसी व्यक्तियों को खुद खाना खाने में भी कठिनाई का अनुभव होता है|

अंतिम अवस्था के लक्षण

  • इस रोग से पीड़ित व्यक्ति अपनी मल मूत्र पर नियंत्रण खो देते हैं|
  • इस रोग से पीड़ित व्यक्ति अपनी दिनचर्या के काम नहीं कर पाते|
  • उन्हें खाने-पीने में भी दिक्कत होती है और खाने के कारण फेफड़ों में चले जाने से कई बार फेफड़ों में इन्फेक्शन हो जाता है|
  • अंत में पूरी तरह से बिस्तर पकड़ लेते हैं और इससे व्यक्ति की मृत्यु होने की संभावना भी बढ़ जाती है|

आंखों में एलर्जी (Eye allergy)

आंखों में एलर्जी (Eye allergy)

आंखों में एलर्जी

आंखों में एलर्जी एक आम समस्या बन गई है जब हमारी आंखों में एलर्जी पैदा करने वाले तत्व जैसे परागकण कॉस्मेटिक , परफ्यूम , धुंआ आदि चले जाते हैं तो इसका असर हमारे कंजक्टिवा पर पड़ता है जिससे आंखों में जलन होने लगती है आंखों में होने वाली एलर्जी को कंजक्टिवा इटिस कहा जाता है| आंखों में एलर्जी पर्यावरण के पदार्थों पर निर्भर करती है एलर्जी कंजक्टिवा इटिस होने पर आंखों में जलन , आंखों में खुजली होना , आंखों से पानी आना , आंख लाल होना आदि लक्षण नजर आने लगते हैं कई बार आंखों से मवाद निकलने लगता है और आंखों की पलकों में सूजन आ जाती है|सही समय पर इलाज करने पर आप इस समस्या से निजात पा सकते हैं|

आंखों में एलर्जी
आंखों में एलर्जी

आंखों में एलर्जी के लक्षण (Eye allergy symptoms )

  • आंखों में एलर्जी होने पर व्यक्ति की आंखों से पानी आने लगता है
  • आंखें लाल होना
  • आंखों में सूजन आना
  • आंखों से मवाद निकलना और पलकों में सूजन आ जाना
  • आंखों के चारों और पपड़ी का जम जाना
  • दृष्टि धुंधली हो जाना ,कई बार आंखों के आगे अंधेरा आने लगता है
  • पढ़ने में कठिनाई का अनुभव होना
  • चीजों का रंग ढंग से दिखाई न देना
  • आंखों के चारों ओर पपड़ी का जम जाना
  • आंखों का तेज रोशनी की ओर संवेदनशील हो जाना

आंखों में एलर्जी होने के कारण (Eye allergy causes

  1. मौसमी एलर्जी – बदलते मौसम के साथ आंखों में जलन , आंखों में पानी , खुजली जैसी समस्याएं पैदा होने लगती है अगर इनका समय पर इलाज न किया जाए तो यह गंभीर रूप धारण कर लेती है|
  2. संपर्क में होने वाले आंखों के रोग– जो व्यक्ति त्वचा के रोग , आंखों में जलन , आंखों में पानी , दाद ,खाज-खुजली आदि से पीड़ित हो ऐसे व्यक्ति को छूने से या ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आने से आंखों में एलर्जी होने लगती है|
  3. घास-कई बार घास पेड़ पौधे फूल भी एलर्जी का कारण बन सकते हैं जिसके कारण आंखों में जलन , खुजली होना , आंखों से पानी आना , आंखे लाल होना जैसी समस्याएं होने लगती है|
  4. धूल-हम जिस पर्यावरण में रहते हैं धूल के कण पाए जाते हैं धूल के कणों में माइक्रोब्स की मात्रा पाई जाती है जिनके कारण आंखों में एलर्जी ,आंखें दर्द होना , आंखों से पानी बहना जैसी समस्याएं होने लगती है|
  5. आंखों की सर्जरी – कई बार व्यक्ति को मोतियाबिंद और रेटिना संबंधी बीमारियां होने पर आंखों की सर्जरी की जाती है आंखों की सर्जरी से कई बार आंखों की समस्याएं पैदा होने लगती है|
  6. उम्र का बढ़ना-उम्र के बढ़ने के साथ व्यक्ति की नजरे कमजोर होने लगती है आंखों की दृष्टि धुंधली हो जाती है|
  7. दवाओं का दुष्प्रभाव – अवसाद दवाओं का सेवन करने से भी व्यक्ति को आंखों से संबंधित समस्या होने लगती है|व्यक्ति की दृष्टि धुंधली पड़ जाती है|
  8. आंखों में ट्यूमर-आंखों में ट्यूमर हो जाना भी आंखों की समस्या का मुख्य कारण है|
  9. दवाओं का दुष्प्रभाव-कई तरह की दवाई और कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स एलर्जी होने के मुख्य कारण है|
  10. अनुवांशिकता-अगर आपके परिवार में किसी व्यक्ति को कोई एलर्जी है ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आने से भी आपको एलर्जी हो सकती है|

आंखों में एलर्जी को ठीक करने के लिए आयुर्वेदिक उपाय (Eye allergy treatment)

  1. हल्दी-हल्दी में एंटी ऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं जो आंखों की सूजन को कम करते हैं हल्दी के पाउडर को एक बर्तन लेकर गर्म पानी में घोल ले अब इस गर्म पानी में किसी कपड़े को भिगो दे इस कपड़े से आंखों की सिकाई करने से आंखों में एलर्जी की समस्या को दूर किया जा सकता है|
  2. एलोवेरा-एलोवेरा में एंटी बैक्टीरियल और एंटी ऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं एलोवेरा की जेल को निकालकर शहद और एल्डर बेरी चाय के साथ मिलाकर इसका मिश्रण बना लें और इस मिश्रण से आंखों को धो ले यह प्रक्रिया दिन में दो से तीन बार दोहराएं जब तक आराम नहीं मिले|
  3. करौंदा-करौंदे का सेवन करने से हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है सोने के पाउडर में शहद को मिलाकर इसका मिश्रण बना लें और रात को सोने से पहले इसका सेवन करें यह नुस्खा बहुत ही लाभदायक है|
  4. ग्रीन टी – एक गिलास पानी में दो से तीन ग्रीन टी को डालकर उबालें इसके ठंडा होने पर इस मिश्रण से आंखों को धोलें यह प्रक्रिया दिन में दो से तीन बार दोहराएं|
  5. खीरा-खीरे में एंटी इरिटेशन गुण पाए जाते है जिससे आंखों में खुजली जलन की समस्या दूर होती है, खीरे की कुछ स्लाइसे को काटकर फ्रिज में रख दे और ठंडा होने पर स्लाइसे को आंखों पर रखें यह प्रक्रिया दिन में तीन से चार बार करें ऐसा करने से आंखों की रोशनी बढ़ती है|
  6. गुलाब जलआंखों में एलर्जी होने पर गुलाब जल की कुछ बूंदें आंखों में डालने से आंखों में एलर्जी को ठीक किया जा सकता है|आंखों की एलर्जी के लिए गुलाब जल का प्रयोग काफी लाभदायक है|
  7. नमक और पानी-एक गिलास ठंडे पानी में थोड़ा सा नमक मिलाकर नमकीन पानी से आंखों को धोने से आंखों में एलर्जी की समस्या से निजात मिलता है| नमक वाले पानी का प्रयोग करने से आंखों की जलन और सूजन को दूर किया जा सकता है | नमक को गर्म पानी के साथ प्रयोग में लाएं ऐसा करने से आपकी आंखों को नुकसान पहुंच सकता है|

आंखों की एलर्जी से बचने के लिए उपाय (Eye allergy remedies)

  • आंखों में जलन होने पर या खुजली होने पर अपनी आंखों को ठंडे पानी से 9-10 छींटे मारे ऐसा करने से आंखों में एलर्जी की समस्या दूर होने में मदद मिलती है|
  • आंखों में एलर्जी जैसी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए अपनी आंखों को बार बार ठंडे पानी से धोएं ऐसा करने से आंखों की एलर्जी की समस्या से राहत मिलती है|
  • आंखों में एलर्जी होने पर गुलाब जल की दो-तीन बूंदें डालने से आंखों को आराम मिलता है इसका प्रयोग दिन में दो से तीन बार करें|
  • कच्चे दूध मे कई प्रकार के तत्व पाए जाते हैं आंखों की एलर्जी और थकान की समस्या को दूर करने में सहायक है कच्चे और ठंडे दूध से आंखे साफ करने से एलर्जी की समस्या दूर होती है|
  • आंखों में खुजली , थकान और आंखों के नीचे बने डार्क सर्कल को दूर करने के लिए कच्चे आलू की कुछ स्लाइस को काटकर आंखों पररखें यह घरेलू नुस्खा बहुत लाभदायक है|
  • रुई के टुकड़े को कैस्टर ऑयल में भिगोकर थोड़ा सा निचोड़कर आंखों पर लगाने से आंखों में एलर्जी की समस्या से आराम मिलता है|

मिर्गी(epilepsy)

मिर्गी (epilepsy)

मिर्गी

मिर्गी एक मस्तिष्क का विकार है जिसमें लोगों को दौरे का अनुभव होता है मिर्गी यानी एपिलेप्सी न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है जिसमें रोगी को बार-बार दौरे पड़ने लगते हैं|मरीज के दिमाग में कई तरह की तरंगें पैदा होने लगती हैं और उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है और मरीज कुछ देर के लिए बेहोश हो जाता है|डब्ल्यूएचओ के अनुसार पूरी दुनिया में 5 करोड लोग मिर्गी से पीड़ित हैं इसका प्रभाव शरीर के किसी एक हिस्से पर देखने को मिल सकता है जैसे हाथ या पैर पर|

पुरुषों में निम्नलिखित स्थितियों में दौरा पड़ने की संभावना बढ़ती है जैसे-शराब का सेवन करना , तनाव होना , पर्याप्त नींद न लेना, ब्लड प्रेशर का कम हो जाना इत्यादि कारणों में मिर्गी के दौरे पड़ने लगते हैं|

मिर्गी के प्रकार (Epilepsy types)

मिर्गी के चार प्रकार होते हैं

1.सामान्यीकृत मिर्गी-सामान्यीकृत मिर्गी यदि आपके पास इस प्रकार की मिर्गी है, तो दौरे मस्तिष्क के दोनों किनारों पर शुरू होते हैं ।अगर पूरे दिमाग में करंट फैलता है और मरीज बेहोश हो जाता है। यह सबके कॉमन है।

 मिर्गी के इस प्रकार के दो मूल प्रकार के दौरे होते हैं:

  • सामान्यीकृत मोटर बरामदगी- इन्हें “ग्रैंड माल” बरामदगी कहा जाता था। वे आपके शरीर को उन तरीकों से स्थानांतरित करने का कारण बनते हैं जिन्हें आप कभी-कभी नाटकीय रूप से नियंत्रित नहीं कर सकते हैं। टॉनिक-क्लोनिक दौरे एक उदाहरण हैं। जब यह हिट होता है, तो आप चेतना खो देते हैं और आपकी मांसपेशियां कड़ी हो जाती हैं और झटका लगता है। अन्य प्रकार के बारे में आप अपने डॉक्टर से बात कर सकते हैं जिसमें क्लोनिक, टॉनिक और मायोक्लोनिक शामिल हैं।
  • सामान्यीकृत गैर-मोटर (या अनुपस्थिति) बरामदगी- उन्हें “पेटिट माल” बरामदगी कहा जाता था। कुछ विशिष्ट प्रकार जिन्हें आप सुन सकते हैं अपने चिकित्सक का उल्लेख विशिष्ट, atypical और मायोक्लोनिक हैं।

2.फोकल मिर्गी-फोकल मिर्गी इस प्रकार की मिर्गी में, मस्तिष्क के एक तरफ एक विशेष क्षेत्र (या मस्तिष्क कोशिकाओं के नेटवर्क) में दौरे विकसित होते हैं। इन्हें “आंशिक बरामदगी” कहा जाता था।इसमें करंट शरीर के एक हिस्से से निकलता है और उसी हिस्से में रहता है।

3.सामान्यीकृत और फोकल मिर्गी-सामान्यीकृत और फोकल मिर्गी जैसा कि नाम से ही पता चलता है, यह एक प्रकार की मिर्गी है जिसमें लोगों को सामान्य और फोकल दौरे दोनों होते हैं। इसमें मरीज कोई हरकत नहीं करता। गुमसुम बैठा रहता है। हाथ हिलने लगता या मुंह हिलाने लगता है लेकिन बात नहीं करता।

4.अज्ञात यदि सामान्यीकृत या फोकल मिर्गी-अज्ञात यदि सामान्यीकृत या फोकल मिर्गी कभी-कभी, डॉक्टर यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी व्यक्ति को मिर्गी है, लेकिन वे नहीं जानते कि बरामदगी फोकल या सामान्यीकृत है या नहीं। यह तब हो सकता है जब आप अकेले थे जब आपके पास दौरे थे, इसलिए कोई भी वर्णन नहीं कर सकता कि क्या हुआ। यदि आपका परीक्षण परिणाम स्पष्ट नहीं हैं, तो आपका डॉक्टर आपके मिर्गी के प्रकार को “अज्ञात या सामान्य और फोकल मिर्गी” के रूप में वर्गीकृत कर सकता है।

मिर्गी के लक्षण (epilepsy symptoms)

  • व्यक्ति की आंखों के आगे अंधेरा छा जाता है
  • व्यक्ति बेहोश हो जाता है
  • व्यक्ति अचानक गिरकर बेहोश हो जाता है
  • मुंह से झाग निकल जाना
  • हाथ पांव में झटके आना
  • चेहरे का नीला पड़ जाना
  • मरीज का दांतो को चबा लेना
  • कपड़ों में पेशाब निकलना

मिर्गी के कारण (epilepsy causes)

  1. जेनेटिक –जेनेटिक इस रोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जींस की समस्या के कारण दिमाग की नसें ठीक से काम नहीं कर रही हो तो मिर्गी के दौरे पड़ सकते हैं|
  2. सिर पर गंभीर चोट -सिर पर गंभीर चोट लगने के कारण भी मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है और दौरे पड़ने लगते हैं|
  3. ऑटिज्म-ऑटिज्म की वजह से भी बच्चों और बुजुर्गों में मिर्गी के दौरे पड़ने की संभावना बढ़ जाती है बढ़ती उम्र के साथ यह रोग होने लगता है|
  4. ब्रेन टयूमर-ब्रेन ट्यूमर की समस्या होने पर भी मिर्गी के दौरे पड़ सकते हैं|
  5. रक्त स्त्राव- मस्तिष्क में रक्त स्त्राव या खून का थक्का जम जाने के कारण में मिर्गी के दौरे पड़ने लगते हैं यह समानता है मस्तिष्क की कमजोरी के कारण होता है|
  6. संक्रमण –मस्तिष्क में संक्रमण होने के कारण भी मिर्गी के दौरे पड़ने की आशंका बढ़ जाती है|
  7. गर्भावस्था-गर्भावस्था की जटिलताओं के कारण स्त्री में हुए मानसिक संक्रमण से भी मिर्गी के दौरे पड़ने लगते हैं|

मिर्गी से बचने के लिए आयुर्वेदिक नुस्खे

  1. तुलसी में काफी मात्रा में एंटी ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं जो मस्तिष्क में फ्री रेडिकल्स को ठीक करते हैं| तुलसी के पत्तों को पीसकर शरीर पर मलने से रोगी को मिर्गी से निजात मिलता है| तुलसी की पत्तियों के साथ कपूर सुंघने  से मिर्गी के रोगी को आराम मिलता है।
  2. प्रोटीन युक्त आहार मिर्गी के रोगी को प्रोटीन और विटामिन युक्त आहार लेना चाहिए सुबह सुबह उठकर मिर्गी के रोगी को गुनगुने पानी के साथ त्रिफला के चूर्ण का सेवन करना चाहिए|
  3. बकरी का दूध मिर्गी के मरीजों के लिए काफी फायदेमंद होता है एक कप दूध में चौथाई कप मेहंदी के पत्तों का रस मिलाकर प्रतिदिन खाना खाने के बाद दिन में दो से तीन बार इसका सेवन करना चाहिए इससे मिर्गी रोग से निजात मिलता है|
  4. शहतूत और अंगूर के रस का सेवन मिर्गी के रोगी के लिए काफी लाभदायक है प्रतिदिन सुबह खाली पेट आधा किलो शहतूत और अंगूर का रस का सेवन करना चाहिए|
  5. प्याज के रस के साथ थोड़ा सा पानी मिलाकर पीना मिर्गी के रोगी के लिए लाभदायक है।
  6. मिर्गी के रोगी को अखरोट का सेवन करना चाहिए यह मस्तिष्क को मजबूत बना देता है और मिलने से भी छुटकारा मिलता है|
  7. बादाम को भिगोकर सुबह छील कर खाने से मिर्गी की समस्या दूर होती हैं|
अखरोट
अखरोट

बालों का झड़ना (Hair loss issue)

बालों का झड़ना (Hair loss issue)

बालों का झड़ना

बालों का झड़ना एक आम समस्या बन गई है|बालों का झड़ना की समस्या से आजकल हर कोई परेशान है|चाहे स्त्री हो या पुरुष आजकल हर कोई बालों को झड़ने से  रोकने के तरीके खोज रहा है कुछ लोगों में यह समस्या जेनेटिक होती है तो वहीं इसके कुछ और कारण भी होते हैं|

बालों का झड़ना की समस्या को डॉक्टरी भाषा में एलोपेसिया कहा जाता है एलोपेसिया होने की समस्या कुछ लोगों में जेनेटिक होती है वहीं इसके कुछ कारण भी होते हैं जैसी पर्याप्त नींद न लेना खानपान आदि हैं|आपके शरीर को पर्याप्त मात्रा में विटामिन न मिलने से भी बाल झड़ने लगते हैं| और तनाव होने के कारण भी बालों का झड़ना की समस्या हो जाती है|आइए यह जानते हैं कि बालों का झड़ना की समस्या के क्या कारण है?

बालों के झड़ने के कारण (Hair loss causes)

  1. टेंशन और स्ट्रेस बाल झड़ने का मुख्य कारण है और इसका सीधा असर उनकी हेल्थ के अलावा बालों पर भी पड़ता है|
  2. विटामिंस जैसे ए ,बी ,सी, डी इन की कमी से भी बाल झड़ने लग जाते हैं बालों को काफी नुकसान पहुंचता है|
  3. बालों में हेयर कलर इस्तेमाल करने से भी बाल झड़ने लग जाते हैं और कमजोर हो जाते हैं|
  4. फंगल इनफेक्शन भी बालों के झड़ने का मुख्य कारण है|बालों में ज्यादा पसीना आने से बाल चिप-चिप से हो जाते हैं जिनकी वजह से लोग शैंपू का प्रयोग ज्यादा करते हैं जिससे बालों का झड़ना और बालों को नुकसान पहुंचता है|
  5. हेयर ड्रायर का इस्तेमाल करने से भी बाल झड़ने लग जाते हैं|
  6. गर्भावस्था में भी हार्मोन में बदलाव के कारण बालों के झड़ने की समस्या उत्पन्न हो जाती है|
  7. बालों के झड़ने का मुख्य कारण डैंड्रफ भी है|
  8. गर्भावस्था में गर्भनिरोधक गोलियां लेने से भी बाल झड़ने शुरू हो जाते हैं|
  9. प्रोटीन और आयरन  की कमी भी बालों का झड़ना के मुख्य कारण है|
  10. आहार में अचानक बदलाव भी बालों का झड़ना का कारण बन सकता है|

मेनोपॉज के कारण गिरने लगें बाल

मेनोपॉज या बढ़ती उम्र में बालों का पतला होना बहुत ही कॉमन है। ऐसा एस्ट्रोजेन लेवल के कम होने से होता है।मेनोपॉज और एजिंग का असर न सिर्फ स्किन पर दिखता है बल्कि बाल भी प्रभावित होते हैं। उम्र बढ़ने के साथ बाल सफेद होने के साथ-साथ पतले भी होने लगते हैं। 40 से 50 वर्ष के आसपास महिलाओं को मेनोपॉज का भी सामना करना पड़ता है, जिसका फिजिकल अपीयरेंस पर भी असर पड़ता है। ब्यूटी एक्सपर्ट शहनाज हुसैन कहती हैं कि बढ़ती उम्र और मेनोपॉज का नकारात्मक प्रभाव त्वचा, बालों और फिगर पर भी होता है। इससे अधिकतर महिलाएं यह सोच बैठती हैं कि वे अब पहले की तरह अट्रैक्टिव नहीं रहीं। दरअसल, एजिंग नेचुरल प्रॉसेस है। समय के साथ शरीर बूढ़ा होने लगता है, जिससे ‘साइन ऑफ एजिंग” झलकने लगती है। इससे डील करके आप बहुत हद तक बालों के झड़ने की समस्या से बच सकती हैं।

बाल क्यों होते हैं पतले

मेनोपॉज या बढ़ती उम्र में बालों का पतला होना बहुत ही कॉमन है।यह ऐसाएस्ट्रोजेन लेवल के कम होने से होता है। बाल अलग-अलग व्यक्तित्व विशेषता और वंशानुगत आधार पर भी सफेद होते हैं। सफेद हुए बालों को दोबारा काला सिर्फ कलरिंग के जरिए ही किया जा सकता। बालों को काला करने के लिए हेयर कलर व डाईकॉमन प्रैक्टिस है, लेकिन इसमें मौजूद केमिकल्स से बाल डैमेज, ड्राई और ब्रिटल होने के साथ बालों के झड़ने की समस्या भी होता है।

बालों का झड़ना रोकने के लिए घरेलू और आयुर्वेदिक उपाय(Hair loss remedies)

  1. बालों की मालिश-बालों में ब्लड सरकुलेशन न हो पानी के कारण आपके बाल झड़ना शुरू हो जाते हैं 1 हफ्ते में दो या तीन बार तेल की मालिश करने पर आपके बालों का झड़ना बंद हो जाएगा|
  2. प्याज का रस-प्याज का रस बालों के लिए बहुत फायदेमंद साबित हुआ है| प्याज का रस बालों में आने से 1 घंटे के लिए लगाकर छोड़ दे  और फिर बालों को अच्छे से धो लें  यह आप हफ्ते में दो-तीन बार कर सकते हैं इससे आपके बाल मजबूत हो जाती है और बालों का झड़ना कम होने लगता है|प्याज में सल्फर नाम का पदार्थ पाया जाता है|
  3. आंवला और एलोवेरा-बालों को मजबूत बनाने के लिए और झड़ने से रोकने के लिए आंवला का प्रयोग बहुत ही मददगार साबित हुआ है आंवले में विटामिन सी पाया जाता है जो बालों को झड़ने से रोकता है|
  4. बालों में नारियल का तेल लगाएं-बालों में नारियल का तेल और सरसों का तेल लगाने से आपकी बाल झड़ने बंद हो जाएंगे और यह बालों की ग्रोथ के लिए भी  फायदेमंद है|
  5. दही और नींबू-दही और नींबू का मिक्सर से सर को सर को मसाज करने के बाद 30 से 40 मिनट के लिए छोड़ दे और फिर किसी नेचुरल शैंपू से बालों को धो ले इससे आपके बालों का झड़ना बंद हो जाएगा और आपके बाल मजबूत हो जाएंगे|

बच्चों में दस्त (Diarrhea)

बच्चों में दस्त (Diarrhea)

बच्चों में दस्त

बच्चों में दस्त की समस्या को अतिसार भी कहते हैं|यदि आपके बच्चों की पू अचानक बहुत कम या बहुत अधिक पानी होती है, औरअधिक लगता और विपुल होती है, तो आपके बच्चों में दस्त की समस्या हो सकती है|इसका अंग्रेजी नाम Diarrhea है|

बच्चों के मल या पू की स्थिति आमतौर पर बच्चों के आहार के साथ उतरावचढ़ाव होती है, जो बनावट, रंग और पू की गंध को प्रभावित कर सकती है| बोतलद्वारा दूध पिलाए गये बच्चे सामान्य रूप से स्तनपान वाले बच्चों की तुलनामें सामान्यत मजबूत गंध पू होते है| उदाहरण के तौर पर एक व्यस्क की मल केमुकाबले, बच्चे को पहली बार कम ठोस लग सकता है|

बच्चों में दस्त के लक्षण

बच्चों में दस्त होने का सबसे आम कारण एक विषाणु है, जिसका नाम है रोटावायरस। यह विषाणु अंतड़ियों को संक्रमित करता है, जिससे गैस्ट्रोएंटेराइटिस होता है। यह आंत की अंदरुनी परत को क्षति पहुंचाता है। इस क्षतिग्रस्त परत से तरल पदार्थ का रिसाव होता है और पोषक तत्वों का समाहन किए बिना भोजन इसमें से निकल जाता है। कुछ मामलों में रोटावायरस गंभीर मल संक्रमण और शरीरमें पानी की कमी की वजह से होता है (डिहाइड्रेशन) का कारण बन सकता है।

रोटावायरस से सुरक्षा के लिए शिशु के टीकाकारण के तहत टीका लगाया जाएगा। यह एक अनिवार्य टीका है। शिशु को कौन सी वैक्सीन लगाई जा रही है, इसे देखते हुए उसे दो या तीन खुराक मिलनी चाहिए। पहली खुराक उसे छह से आठ हफ्ते की उम्र में मिलनी ​चाहिए, दूसरी खुराक 10 से 16 हफ्तों के बीच और तीसरी खुराक करीब 14 से 24 हफ्तों के बीच लगनी चाहिए।

ध्यान रखें कि छह हफ्ते से कम उम्र और चार महीने से अधिक उम्र के शिशु को इस टीके की पहली खुराक नहीं दी जा सकती है। यदि आपने यह टीका शिशु को नहीं लगवाया है, तो शिशु के डॉक्टर से बात करें।

बच्चों में दस्त के कारण

  • सबसे आम कारण है, की एक बच्चों में दस्त होता है, जब वायरस से संक्रमण होता है| इसे गैस्ट्रोएंटेरिटिस के रूप में संदर्भित किया जाता है, और उल्टी के साथ या इसके बिना हो सकता है| गैस्ट्रोएंटेरिटिस भी वैक्टीरिया यापरजीवी के संपर्क के कारण हो सकता है|
  • वायरस, वैक्टीरिया या परजीवी बच्चे को दुसरे व्यक्ति से संपर्क दूषित भोजन या पानी के उपयोग के माध्यम से या अगर एक शौचालय जैसे-दूषित सतह को छूता है, और उसके बाद मुह में हाथ डालता है तो उसको पारित किया जा सकता है|

मुझे डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए?

अगर शिशु में नीचे दिए गए ये लक्षण दिखाई दें, तो आपको शिशु के डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। हालांकि ये लक्षण इतने आम नहीं हैं, मगर फिर भी इन पर ध्यान देने की जरुरत है। जैसे कि:

  • उल्टी, जो 24 घंटो से ज्यादा जारी रहे
  • बुखार, जो 24 घंटो से ज्यादा जारी रहे
  • शिशु कोई तरल पदार्थ नहीं ले रहा है
  • उसके मल में खून आ रहा है
  • काला मल
  • पेट पर सूजन
  • अत्याधिक रोना

बच्चों में दस्त को दोबारा होने से ब्चाने के  उपाय

  • अपने शिशु के हाथ भी अक्सर धोना याद रखें। आपका शिशु अपनी उंगलियां मुंह में लेकर डायरिया पैदा करने वाले इनफेक्शन की चपेट में आ सकता है। इसी कारण शिशु के खेलने की जगह पर गंदा पानी या गंदे खिलौने या कोई अन्य दूषित चीज नहीं होनी चाहिए।
  • यदि आपके घर में पालतू जानवर है, तो सुनिश्चित करें कि वे घर में मल त्याग न करें। अस्वस्थ जानवर को पशुओं के डॉक्टर के पास ले जाएं और पूरी तरह ठीक होने तक उसे शिशु के कमरे में न आने दें।
  • साथ ही, खाना बनाने और कच्चे मांस और सब्जियों का काम करने के बाद आप अपने हाथ अवश्य धोएं। सुनिश्चित करें कि आप खाना तैयार करने और पकाने के सुरक्षित तरीकों का पालन करें।
  • अपने शिशु को स्वस्थ रखने के लिए यह जरुरी है कि उसे अच्छा पालन-पोषण मिले। सुनिश्चित करें कि आप शिशु का टीकाकरण समय पर कराएं। यदि आपको टीकों को लेकर कोई चिंता या सवाल हैं तो डॉक्टर से बात करें।

बच्चों में दस्त के लिए घरेलू उपचार

  1. केला-केले में भी पेक्टिन होता है। पेक्टिन, अंतडियों के आस-पास एक सुरक्षात्मक परत का निर्माण करता है तथा अंतडों में मौजूद अधित द्रव पदार्थ को सोखता है। इसके अलावा, केलों में पोटेशियम भरपूर मात्रा में पाया जाता है| जोइलेक्ट्रोलाइट्स को घटाने में मदद करते हैं।आप अपने बच्चे को 1 केला खाने को दे सकते है ।
  2. मेथी दाना-मेथी के दाने बहुत गरम होते हैं जिसके कारण इसे दस्त के इलाज में बहुत फायदेमंद माना जाता है। इसका इस्तेमाल दस्त से निजात पाने के लिए किया जाता है। इसके लिए आप दिन में 2-3 बार एक चम्मच भिगोए हुए मेथी के दानों को एक कप दही में मिलाकर अपने बच्चे को खिलाये।
  3. दही-दही में लाइव-क्लटर्स; नामक बैक्टीरिया होता है। यह बैक्टीरिया दस्त से छुटकारा पाने के लिए लैक्टिक एसिड को उत्पन्नकरता है तथा अंतडों को एक सुरक्षात्मक कवच प्रदान करता है।आप अपने बच्चे को दही खाने की आदत जरुर डाले। 10 ग्राम दही मे 1 चमच्च खसखस मिलाकर बच्चो को देने से लाभ होता है।
  4. आलू-चावल के अलावा, आलू में भी भारी मात्रा में स्टार्च पाया जाता है। अतः दस्त के इलाज में आलू के फायदेमंद विकल्प साबित होगा।इसके लिए आपको आलूओं को उबालकर खाने की जरुरत है। उबले हुए आलूओं पर मिर्च-मसाला या चाट पाउडर डालकर ना खाएं।साथ ही, इन्हें फ्रेंच फ्राइज़ के रुप में भी ना खिलाये क्योंकि इस तरह उनका पेट और खराब हो सकता है।आपको एक बात पर ध्यान देने की जरुरत है कि दस्त से निजात पाने के लिए आपको स्टार्च की जरुरत है ना कि मसालेदार चटपटे व्यंजनों की।
  5. चायपत्ती-नवजात और छोटे बच्चों को चाय पत्ती को पानी में घोलकर वह पानी एक या दो चम्मच करके पिलाया जा सकता है। इससे भी दस्त रूक जाएंगे।
  6. सौंफ-10ग्राम सोंफ को कुट्कर उबलते हुए पानी मे डाल दे और थंडा कर ले ।थंडा होने के बाद उसे मसलकर छान ले और 1 चम्मच पानी1 या 2 चम्मच दुध मे मिलाकर दिन मे तीन बार बच्चे को पिलाने से मरोड़ , अपच ,पेट फुलना ,दस्त आदि नही होते है।दिन निकलते समय यह सौंफ का पानी बच्चे को पिलाने से बच्चे ठीक रहता है।
  7. अदरक-डायरिया के इलाज में अदरक एक स्वस्थ व प्रभावी विकल्प है। अदरक खाने को पचाने में मदद करता है तथा पाचन स्वास्थ्य को बनाए रखता है।सोंठ या जायफल आथवा दोनो को पानी मे घिसकर 3 रती सुबह- शाम देने से फायदा होता है|
सौंफ
सौंफ