ओस्टियोआर्थराइटिस

ओस्टियोआर्थराइटिस

ओस्टियोआर्थराइटिस(Osteoarthritis) को अंग्रेजी में विअर एंड टिअर या डिजनरेटिव आर्थराइटिस भी कहा जाता हैं।शरीर में ऊतकों के समूह को कार्टिलेज कहा जाता हैं। कार्टिलेज शरीर के ऊतकों को मजबूत बनाने का कार्य करते हैं साथ ही शरीर के जोड़ों को लचीला भी बनाते हैं।

कार्टिलेज को जब हानि पहुँचती है तब हड्डियाँ आपस में रगड़ने लगती है। जिसके कारण जोड़ों में दर्द और सूजन उत्पन्न हो जाती है। महिलाओं में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है। 

बढ़ती उम्र के साथ ऑस्टियोआर्थराइटिस की समस्या भी बढ़ती जा रही है। इस प्रकार की आर्थराइटिस में जोड़ों के कार्टिलेज घिस जाते हैं और उनमें चिकनाहट कम होने लगती है। इस स्थिति को सहज मेडिकल भाषा में ऑस्टियोआर्थराइटिस कहते हैं।ओस्टियोआर्थराइटिस अधिकतर घुटनों, कूल्हों, हाथों, और पैरों में होता है|

ओस्टियोआर्थराइटिस
ओस्टियोआर्थराइटिस ( जोड़ो में दर्द )

ओस्टियोआर्थराइटिस के लक्षण

  • मांसपेशियों में कमजोरी आ जाती है और जोड़ों को घुमाने में कठिनाई का अनुभव होता है|
  • प्रभावित जोड़ों पर सूजन हो जाती है|
  • दिनभर की गतिविधि के पश्चात् जोड़ों में दर्द बढ़ जाता है|
  • लम्बे उपयोग के या लम्बे आराम के बाद जोड़ के प्रभावित क्षेत्र में दर्द का अनुभव होना|
  • लंबी निष्क्रियता के पश्चात् दर्द और जकड़न जो गतिशील होते ही तुरंत चली जाती है|

ओस्टियोआर्थराइटिस के कारण

  1. जोड़ों में चोट लगना-चोट लगने के बाद या जोड़ों के ऑपरेशन के बाद जोड़ों की ठीक ढंग से देखभाल ना करना इसरो का मुख्य कारण बन सकता है|
  2. वजन का बढ़ना-अधिक वजन होने के कारण यह रोग होने की संभावना बढ़ जाती है|वजन ज्यादा होने के कारण घुटनों टखनों और कूल्हों आदि के जोड़ों पर बहुत ज्यादा वजन बढ़ना इस रोग का मुख्य कारण है|
  3. अनुवांशिकता के कारण-परिवार में किसी एक महिला को यह रोग होने से दूसरे व्यक्ति में इस रोग के होने की संभावना बढ़ जाती है|
  4. उम्र का बढ़ना-उम्र बढ़ने के साथ-साथ ऑस्टियोआर्थराइटिस की समस्या उत्पन्न हो जाती हैबढ़ी हुई उम्र भी इसके लिए जिम्मेदार है|

जोड़ों में दर्द के आयुर्वेदिक नुस्खे

  1. लहसुन- इसका इस्तेमाल-आप जोड़ों के दर्द से निजात पाने के लिए कर सकते हैं |लहसुन के औषधीय जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करता है इसके लिए लहसुन की दो कलियां प्रतिदिन खाली पेट पानी के साथ खाएं यह बहुत फायदेमंद है|लहसुन के रस को कपूर में मिलाकर मालिश करने से भी दर्द से राहत मिलती है।
  2. हल्दी- हल्दी रक्त के संचार को तेज करता है और जोड़ों के दर्द से आराम दिलाता है गर्म दूध में हल्दी मिलाकर दिन में दो से तीन बार पीयें।
  3. अदरक- अदरक का प्रयोग करके हम जोड़ों के दर्द से निजात पा सकते हैं|अदरक का पेस्ट बनाकर उसमें दो चम्मच शहद मिलाकर सेवन करें|
  4. लाल मिर्च पाउडर-एक कप नारियल के तेल को गर्म करके उसमें दोष बड़े चम्मच लाल मिर्च पाउडर मिलाएं इस मिश्रण को प्रभावित हिस्से पर लगा कर कम से कम 20 से 30 मिनट के लिए छोड़ दें यह नुस्खा बहुत ही फायदेमंद है|
  5. सेब का सिरका-सेब के सिरके का प्रयोग करने से हमें जोड़ों के दर्द और सूजन से राहत मिलती है किसी कपड़े को सेब के सिरके में भिगोकर दर्द वाले स्थान पर लपेटे और कुछ समय के लिए छोड़ दें यह घरेलू उपाय बहुत ही लाभदायक है|
  6. मेथी दाना- 5से 10 ग्राम मेथी के दानों का चूर्ण बनाकर सुबह पानी के साथ लें।यह नुस्खा बहुत ही फायदेमंद है|

ऑस्टियोआर्थराइटिस का इलाज

1.एक्‍सरसाइज करें

ऑस्टियोआर्थराइटिस के दर्द को दूर करने के लिए एक्‍सरसाइज करें। यह क्षतिग्रस्त जोड़ों के आसपास की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है।यह जोड़ों के आसपास की पेशी का समर्थन मजबूत करता है। और जोड़ों में सुधार और जोड़ों की गतिशीलता बनाये रखता है। 

2.थेरेपी

फिजियोथैरेपी

  • फिजियोथैरेपी गति और लचीलापन की सीमा को बढ़ाने के साथ ही पैर की मांसपेशियां मजबूत बनाती है
  • घुटने के मूवमेंट और लचीलापन को सामान्य करती है
  • बैठने और चलने की तकनीकी में सुधार करती है
  • शरीर के निचले भागों जैसे को ले जोड़ो को मजबूत बनाती है
  • नी कैप के दर्द में कमी और मूवमेंट में सुधार का कारण बनती है की गतिशीलता बनाये रखता है। 

ओस्टियोआर्थराइटिस में लेने वाले आहार

  • आप विटामिन C से समृद्ध आहार जैसे स्ट्रॉबेरी, खट्टे फल, मिर्च, कीवी, हरी-पत्तेदार सब्जियाँ, टमाटर, आलू आदि का सेवन कर सकते है|
  • बीटा-कैरोटीन युक्त आहार जैसे पीले, लाल और नारंगी रंग के फल और सब्ज़ियाँ खा सकते है।
  • ओमेगा-3 फैटी एसिड से समृद्ध आहार जैसे ठन्डे-पानी की मछली, अखरोट, सोया आहार, जैतून, अलसी और अलसी का तेल भी अपने सेवन में शामिल कर सकते है।
हरी सब्जियाँ
हरी सब्जियाँ

एड्स

एड्स

एड्स का मतलब है उपार्जित प्रतिरक्षी अपूर्णता सहलक्षण (Acquired Immune Deficiency syndrome)। एड्स HIV मानवीय प्रतिरक्षी अपूर्णता विषाणु (Human immunodeficiency virus) से होता है जो कि मानव की प्राकृतिक प्रतिरोधी क्षमता को कमजोर करता है। जब एच.आई.वी. द्वारा आक्रमण करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता क्षय होने लगती है तो इस सुरक्षा कवच के बिना एड्स पीड़ित लोग भयानक बीमारियों क्षय रोग और कैंसर आदि से पीड़ित हो जाते हैं और शरीर को कई अवसरवादी संक्रमण यानि आम सर्दी जुकाम, फुफ्फुस प्रदाह इत्यादि घेर लेते हैं। एच.आई.वी. रक्त में उपस्थित प्रतिरोधी पदार्थ लसीका-कोशो पर हमला करता है। ये पदार्थ मानव को जीवाणु और विषाणु जनित बीमारियों से बचाते हैं और शरीर की रक्षा करते हैं। जब क्षय और कर्क रोग शरीर को घेर लेते हैं तो उनका इलाज करना कठिन हो जाता हैं और मरीज की मृत्यु भी हो सकती है।

क्या है HIV

एड्स यानी एक्वायर्ड इम्युनोडेफिशिएंसी सिन्ड्रोम एक बीमारी है जो ह्यूमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस या एचआईवी (HIV) के कारण होती है|एचआईवी संक्रमण होने के तुरंत बाद यह एक ‘फ्लू’ जैसी बीमारी होती है. फ्लू केवल कुछ दिनों तक रहता है और बहुत हल्का होता है इस कारण लोग इसे पहचान नहीं पाते| यह वायरस धीरे-धीरे व्यक्ति की संक्रमण से लड़ने की क्षमता कम कर देता है. जब शरीर की प्रतिरोधक क्षमता इतनी कम हो जाती है कि वह संक्रमण का विरोध नहीं कर पाता, तो कहा जाता है कि व्यक्ति को एड्स हो गया है|

एड्स के लक्षण

  • एड्स मे व्यक्ति को सिर दर्द और थकान का अनुभव होता है|
  • इस रोग में व्यक्ति को बुखार हो जाता है|
  • व्यक्ति के गले में खराश रहती है|
  • इस रोग में व्यक्ति को भूख कम लगती है और उनका वजन कम होने लगता है|
  • इस रोग में व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई का अनुभव होता है|
  • शरीर पर कई तरह के निशान  का होना|
  • मतली, उल्टी आना |
  • लसीकाओं में सूजन आ जाती है|
Symptoms_of_AIDS
Symptoms_of_AIDS( एड्स के लक्षण )

एड्स के कारण

  1. अगर सामान्य व्यक्ति किसी पीड़ित व्यक्ति के साथ यौन संबंध स्थापित करता है तो यह रोग होता है|
  2. संक्रमित व्यक्ति का ब्लड अ‍ॅसंक्रमित व्यक्ति को देने से इस रोग के होने की संभावना बढ़ जाती है|
  3. संक्रमित ऑर्गन ट्रांसप्लांट से भी व्यक्ति को एड्स हो जाता है |
  4. अगर कोई महिला एच आई वायरस से संक्रमित है तो वह स्तनपान के द्वारा अपने बच्चे को भी इस रोग से संक्रमित कर सकती है|

एड्स से बचाव के उपाय

  1. उपयोग किए हुए इंजेक्शन का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि ये एच.आई.वी. संक्रमित हो सकते हैं।
  2. डॉक्टर को खून चढ़ाने से पहले पता करना चाहिए कि कहीं खून एच.आई.वी. दूषित तो नहीं है।खून चढ़ाने से पहले उसकी अच्छी तरह से जांच कर लेनी चाहिए|
  3. पीड़ित साथी या व्यक्ति के साथ योनि सम्बन्ध स्थापित नहीं करना चाहिएऔर सावधानीपूर्वक कंडोम का प्रयोग करना चाहिए। 
  4. सामान्य व्यक्ति को एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्ति के वीर्य, योनि स्राव अथवा रक्त के संपर्क में आने से बचना चाहिए।
  5. दूषित रक्त के संपर्क में आने से बचना चाहिए|

एड्स से बचने के लिए कुछ आयुर्वेदिक नुस्खे

  1. काली तुलसी के पत्ते , गिलोय के जड़ की खाल , हरसिंगार के पत्ते , नीम के कोमल एवं ग्वारपाठा का गूदा इन सभी को बराबर मात्रा में लेकर खूब महीन पीसकर 1 घंटे तक खरल में घोटेइसमें 10 दाने काली मिर्च के डालकर आधा घंटा तक घोटे| इस मिश्रण का 50 ग्राम सुबह,50 ग्राम शाम को पीने से शरीर के सभी प्रकार के विषाणु नष्ट हो जाते हैं और शरीर स्वस्थ होकर गुलाब की तरह  खिल जाता है|
  2. धतूरे की जड़ की छाल , बरगद के कोमल टू से इन दोनों को खूब किस कर चार गुना पानी और बराबर मात्रा में गाय का घी लेकर एक मिट्टी की हांडी में रखकर गर्म करें| हल्की आंच पर गर्म करते हुए जब सारा पानी जलकर केवल  घी रह जाए तो उसे छानकर बोतल में बंद कर ले|10 ग्राम  प्रतिदिन खाएं साथ में ग्वारपाठे की गुदे का शरबत एवं गिलोय का काढ़ा पिएइस नुस्खे से शरीर के विषाणु नष्ट होते हैं और रक्त के श्वेत कणों में वृद्धि होती है|
  3. केले के तने प्रतिदिन सुबह बासी मुंह पिएशाम में एक चावल भर केसर गर्म दूध के साथ पिए|

निमोनिया

निमोनिया

निमोनिया एक तरह का छाती या फेफड़े का इनफेक्शन है, जो एक या फिर दोनों फेफड़ों को प्रभावित करता है। इसमें फेफड़ों में सूजन आ जाती है और तरल पदार्थ भर जाता है, जिससे खांसी होती है और सांस लेना मुश्किल हो जाता है। निमोनिया सर्दी-जुकाम या फ्लू के बाद हो सकता है, विशेषकर सर्दियों के महीनों में। यह बहुत से संभावित विषाणुओं और जीवाणुओं की वजह से हो सकता है। शिशुओं और छोटे बच्चों में रेस्पिरेटरी सिंसिशियल वायरस (आरएसवी) नामक विषाणु वायरल निमोनिया का सबसे आम कारण है।निमोनिया किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, यह शिशुओं और छोटे बच्चों मे अधिक आम व गंभीर हो सकता है।

फेफड़े का इनफेक्शन
फेफड़े का इनफेक्शन

निमोनिया के विभिन्न प्रकार

  1. लोबर निमोनिया :लोबर निमोनिया फेफड़ों के एक या अधिक भाग को प्रभावित करता है।
  2. ब्रोंकाइल निमोनिया :यह दोनों फेफड़ों में चकत्ते बना देता है।

निमोनिया होने के लक्षण

  • खांसी के साथ बलगम आना।
  • खांसते समय छाती में दर्द होना।
  • उल्टी या दस्त होना।
  • भूख में कमी होना।
  • थकान होना।
  • बुखार होना।

निमोनिया होने के कारण

निमोनिया होने के तीन कारण हो सकते हैं बैक्टीरिया, वायरस और कभी-कभी कवक फंगी के कारण होता है ज्यादातर मामलों में ही निमोनिया बैक्टीरिया के कारण होता है लेकिन वायरल निमोनिया बच्चे को सबसे अधिक प्रभावित करता है|

  • इम्यून सिस्टम कमजोर होना भी निमोनिया का महत्वपूर्ण कारण है|
  • वायरल इनफेक्शन जैसे सर्दी बुखार खांसी और इन्फ्लूएंजा के कारण भी निमोनिया हो सकता है|
  • गले में कफ की समस्या होना भी निमोनिया का कारण बन सकता है|
  • इम्यून सिस्टम कमजोर होना भी निमोनिया का महत्वपूर्ण कारण है|
  • वायरल इनफेक्शन जैसे सर्दी बुखार खांसी और इन्फ्लूएंजा के कारण भी निमोनिया हो सकता है|

बच्चों में निमोनिया के आयुर्वेदिक नुस्खे

  1. हल्दी : बच्चे को निमोनिया में आराम दिलाने के लिए हल्दी काफी फायदेमंद मानी जाती है। हल्दी में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं, जो कई बीमारियों से दूर रखने में मदद करते हैं। निमोनिया होने पर थोड़ी-सी हल्दी गुनगुने पानी में मिलाएं और बच्चे की छाती पर लगाएं। इससे बच्चे को राहत मिलेगी।
  2. लहसुन का पेस्ट :लहसुन को भी निमोनिया के लिए कारगर माना जाता है।इसके लिए लहसुन की कुछ कलियों को पीसकर उसका पेस्ट बना लें और रात को सोनेसे पहले बच्चे की छाती पर लगाएं। इससे बच्चे के शरीर को गर्माहट मिलेगी और कफ बाहर निकल जाएगा।
  3. लौंग :इसके लिए एक गिलास पानी में 5-6 लौंग, काली मिर्च और एक ग्राम सोडा डालकर उबाल लें। इस मिश्रण को दिन में दो बार अपने बच्चे को दें।इसकेअलावा, लौंग का तेल छाती पर लगाने से भी बच्चे को राहत मिल सकती है।
  4. तुलसी :तुलसी में एंटी-इन्फ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं।तुलसी की कुछ पत्तियों को पीस कर उसका रस थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दिन में दो बारबच्चे को पिलाने से निमोनिया में राहत मिलती है।
  5. प्रदूषण से दूर रखें :श्वसन संबंधी समस्या दूर रहे, इसकेलिए जरूरी है कि आप अपने बच्चे को धूल-मिट्टी व प्रदूषण वाली जगह से दूररखें। बच्चे को उस माहौल में न रहने दें, जहां आस पास लोग धूम्रपान करते हों। इससे उन्हें सांस संबंधी परेशानियां जल्दी पकड़ सकती हैं।
  6. पर्याप्त पोषण दें : किसी भी तरह की बीमारी से बचने केलिए जरूरी है कि बच्चे को पर्याप्त पोषण दिया जाए, ताकि उसकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बने और वो बीमारियों से लड़ सके। अगर बच्चा छह महीने से कम का है, तो उसे नियमित रूप से स्तनपान कराएं, क्योंकि स्तन दूध में एंटीबॉडीज होते हैं, जो प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मदद करते हैं। वहीं, अगर बच्चा ठोस आहार खाता है, तो उसे जरूरी पोषक चीजें भरपूर मात्रा में खिलाएं।
  7. संपूर्ण टीकाकरण :बच्चे को निमोनिया से बचाने के लिए सबसे जरूरी है कि उसे बचपन में सभी जरूरी टीके लगें।
  8. छींकते-खांसते समय हमेशा मुंह और नाक को ढक लें। इसके अलावा, समय-समय पर बच्चे के हाथ भी धोती रहें।
  9. भीड-भाड़ वाली जगह से दूर रहें :बच्चों को भीड़भाड़ वाले स्थानों पर संक्रमण फैलने का खतरा ज्यादा होता है|
लौंग
लौंग

मैकुलर डिजनरेशन (चकत्तेदार अध: पतन)

मैकुलर डिजनरेशन (चकत्तेदार अध: पतन)

मैकुलर डिजनरेशन इसी मैक्युला के  क्षतिग्रस्त होने के कारण क्षतिग्रस्त  होने वाली एक सामान्य आंख की बीमारी है इससे कुछ लोगों को अंधापन होने की संभावना हो सकती है| आंख का मैक्यूला पेनी और केंद्रित नजर के लिए आवश्यक होता है यह रेटीना के केंद्र के पास एक छोटे से निशान के रूप में दिखाई देता है| मैक्युला हमारी आंख की सीध में आने वाली किसी भी वस्तु को देखने में हमारी सहायता करता है|

मैकुलर डिजनरेशन
मैकुलर डिजनरेशन

मैकुलर डिजनरेशन के प्रकार

मैकुलर डीजंनरेशन दो प्रकार का होता है:-

  • ड्राई मैकुलर डिजनरेशन
  • वेट मैकुलर डिजनरेशन
  • ड्राई मैकुलर डिजनरेशन-ड्राई मैकुलर डिजनेरेशन में आँख के मैक्युला में एक पीले रंग का पदार्थ इकट्ठा हो जाता है जिसे ड्रुसन (पीले रंग के गुच्छे ) कहा जाता है। यदि यह गुच्छे कम होते हैं, तो इससे देखने की क्षमता पर कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन यदि इनका आकार बढ़ जाता हैं तो व्यक्ति को  किसी चीज को ध्यान से देखते समय कम दिखाई देने लगता है। यदि यह समस्या सामान्य से कहीं ज़्यादा बढ़ जाए तो आँखों के उस हिस्से की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं , इस स्थिति में व्यक्ति की केंद्रीय दृष्टि  बहुत कम हो जाती है।
  • वेट मैकुलर डिजनरेशन-यह वह अवस्था होती है, जिसमें मैक्युला के नीचे कोरोज़ से रक्त वाहिकाओं की असामान्य बढ़ोत्तरी हो जाती है। इस स्थिति को कोरोएडियल नेवस्क्यराइजेशन कहा जाता है। अत्यधिक फुलाव के कारण इन रक्त वाहिकाओं को क्षति पहुँच जाती है और इससे रेटिना में रक्त और तरल का रिसाव होना शुरू हो जाता है। इसके कारण आँखों की सतह पर लहरदार पंक्तियों के साथ-साथ जगह-जगह चकते बन जाते हैं। इसके कारण भी व्यक्ति के देखने की क्षमता कम हो जाती है|

मैक्युला डिजनरेशन के लक्षण

  • गीले धब्बेदार अध: पतन में सबसे आम लक्षण है सीधी रेखाएं जो टेढ़ी या लहराती दिखाई देती हैं। इसका परिणाम तब होता है जब लीक हुई रक्त वाहिकाओं से द्रव भीतर इकट्ठा होता है और मैक्युला को विकृत करता है, दृष्टि को विकृत करता है। दृष्टि के मध्य क्षेत्र में ग्रे या काले रंग के बड़े क्षेत्र भी हो सकते हैं। केंद्रीय दृष्टि थोड़े समय के लिए कम हो सकती है।
  • अपने सामने की वस्तुओं को देखने में दिक्कत महसूस होना|
  • इस रोग में व्यक्ति की नजर कमजोर हो जाती है और उसे कभी धुंधला और कभी साफ दिखाई देने लगता है|
  • वस्तुएं सामान्य आकार की तुलना में छोटी दिखाई देने लगती है|
  • आंखों का लाल होना और दर्द होना इस रोग का मुख्य लक्षण है|

मैकुलर डिजनरेशन के कारण

  • उम्र– बढ़ती उम्र के साथ इस रोग के होने की संभावना बढ़ती रहती है पूरा से 70 वर्ष की आयु के बीच यह समस्या आम हो जाती है|
  • धूम्रपान- बीड़ी , सिगरेट , शराब , तंबाकू , गुटखा आदि का सेवन करने से इस रोग के होने की संभावना बढ़ जाती है|धूम्रपान करने से व्यक्ति की रेटिना पर बहुत बुरा असर पड़ता है|धूम्रपान कैंसर ही नहीं बल्कि आंखों की रोशनी का भी कारण बनता है|
  • हृदय रोग- जो व्यक्ति हृदय रोग से पीड़ित हो उनमें इस रोग के होने की आशंका बनी रहती है|
  • तनाव-बीमारी होने की अवस्था में व्यक्ति को तनाव जैसी समस्याएं हो सकती है| मैकुलर डिजनरेशन का शुरुआती लक्षण तनाव है|

आंखों के धब्बे दार विकार की रोकथाम के उपाय

  • धूम्रपान न करें– धूम्रपान करना मैकुलर डिजनरेशन का मुख्य कारण है धूम्रपान करने से आंखों के धब्बे दार विकार होने की संभावना बनी रहती है इसलिए धूम्रपान का सेवन न करें|
  • पोषण– हमें प्रतिदिन की आहार में पौष्टिक आहार को शामिल करना चाहिए| खाने में हरी पत्तेदार सब्जियां , ताजे फल का सेवन करें क्योंकि इसमें एंटी ऑक्सीडेंट मात्रा होती है जो हमें बीमारियों से बचाती है|
  • मछली का सेवन- अपने प्रतिदिन के बाहर में मछली का सेवन कीजिए क्योंकि इसमें ओमेगा 3 फैटी एसिड की मात्रा पाई जाती है जो ड्राइ मैकुलर डिजनरेशन होने की संभावना को कम करती है|
  • विटामिन और जिंक का सेवन– विटामिन और जिंक का सेवन करने से आंखों की रोशनी को समाप्त होने से बचा सकते हैं|
  • अखरोट का सेवन- अपने प्रति दिन की आहार में अखरोट को शामिल करें इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड की मात्रा होती है जो हमें आंखों के रोगो को होने से बचाती है|
  • सर्जरी के द्वारा- अगर किसी व्यक्ति को हुई है विकार दोनों आंखों में हो गया है तो टेलीस्कोपिक लेंस का प्रयोग करके आंखों की रोशनी को बढ़ाया जा सकता है|
अखरोट
अखरोट

मोतियाबिंद

मोतियाबिंद

मोतियाबिंद जिसे हम सफेद मोतिया भी कहते हैं जिसमें आंख के प्राकृतिक पारदर्शी लेंस का धुंधलापन हो जाता है| 50 वर्ष से अधिक आयु के लोगों मे यह रोग होने की संभावना बढ़ जाती है |आंखों की दृष्टि को खो देना इस रोग का मुख्य कारण है|कैटरेक्ट आंखों की बीमारी है| मोतियाबिंद को कैटरेक्ट भी कहते हैं| इसमें व्यक्ति को धुंधला दिखाई देने लगता है |चश्मा लगाने की बात भी साफ दिखाई नहीं देता तो तुरंत चिकित्सक से सलाह लेकैटरेक्ट की समस्या 40 साल की उम्र से कम उम्र वालों को भी हो रही है| आश्चर्यजनक रूप से यह रोग सामान्य उम्र 50 से 70 वर्ष के बुजुर्गों में ही होता है|

मोतियाबिंद
मोतियाबिंद

मोतियाबिंद के प्रकार

  1. सबसैप्सुलर मोतियाबिंद जो की लेंस के पीछे की तरफ होता है । मधुमेह वाले लोग या स्टेरॉयड दवाओं की उच्च खुराक लेने वाले लोगों में एक उप-कोशिकीय मोतियाबिंद विकसित होने का अधिक खतरा होता है ।
  2. न्यूक्लियर मोतियाबिंद लेंस के केंद्रीय क्षेत्र (नाभिक) में होता है । न्यूक्लियर मोतियाबिंद आमतौर पर उम्र बढ़ने के साथ- साथ बढ़ता है ।
  3. कॉर्टिकल मोतियाबिंद की विशेषता सफेद,कील जैसी ओपेसिटी होती है जो लेंस की परिधि में शुरू होती है और धीरे धीरे केंद्र की तरफ बढ़ती है  जैसे – एक पहिये का आरा ।

मोतियाबिंद के लक्षण

  1. मोतियाबिंद होने पर चश्मे का नंबर बदलता रहता है चश्मे का नंबर कभी कम होता है तो कभी ज्यादा होता है|
  2. रात में कम दिखना यह रोग होने पर व्यक्ति को रात में देखने की समस्या होती है व्यक्ति को रात में ड्राइविंग करने में परेशानी हो सकती है |
  3. बुजुर्गों में दृष्टि कमजोर होने के कारण रंगों में अंतर न कर पाना इस रोग का मुख्य लक्षण है|
  4. आंखों में धुंधलापन आ जाता है ठीक से दिखाई नहीं देता|हल्की रोशनी का तेज प्रतीत होना|
  5. बुजुर्गों में यह रोग होने के कारण बार-बार चश्मे के नंबर बदलते रहते हैं |
  6. नजर का धुध्ला होना ही कैटरेक्ट की शुरुआत है|

मोतियाबिंद होने के कारण

  1. सिगरेट व शराब धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों को मोतियाबिंद होने का खतरा अधिक होता है उन्हें आंखों के न्यूक्लीयर हिस्से में मोतियाबिंद होने का खतरा रहता है जो बाकी की तरह की मोतियाबिंद से ज्यादा दृष्टि को हानि पहुंचाता है|
  2. पर्यावरण कारक लंबे समय तक पर्यावरण लीड के संपर्क में आने से मोतियाबिंद होने का खतरा बढ़ जाता है|
  3. उम्र कुछ लोगों में 40 से 50 वर्ष की उम्र में मोतियाबिंद का विकास हो जाता है यह 60 साल की उम्र में दृष्टि को प्रभावित करते हैं|
  4. अनुवांशिकता भी इस रोग का मुख्य कारण है परिवार के किसी सदस्य को यह रोग होने पर आपको मोतियाबिंद होने की संभावनाएं बढ़ जाती है
  5. मधुमेह से ग्रस्त लोगों को मुरतिया भिन्न होने का खतरा बना रहता है जिन लोगों को निकट की दृष्टि की समस्याएं हैं उन्हें मोतियाबिंद होने का खतरा ज्यादा रहता है जिससे आंखों में सूजन भी आ जाती है|
  6. सूर्य के प्रकाश से कम उम्र में ज्यादा सूरज की किरणों के संपर्क में आने से शुरू होने की संभावना बढ़ जाती है|
  7. पोषण की कमी , विटामिन सी , विटामिन ई की कमी से भी यह रोग हो जाता है|

मोतियाबिंद से बचने के लिए आयुर्वेदिक उपाय

  1. एक चम्मच पिसा हुआ धनिया एक कप पानी में उबालकर छावनी ठंडा होने पर सुबह शाम आंखों में डालने से मोतियाबिंद में आराम मिलता है|
  2. आंवले का रस , गाजर , पालक का सेवन करने से मोतियाबिंद रोग जड़ से खत्म हो जाता है 2 से 3 महीने इनके पदार्थों को प्रतिदिन के सेवन में शामिल करें|
  3. हल्दी में करक्यूमिन नामक रसायन होता है जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है हल्दी मोतियाबिंद को होने से रोकती है इसलिए हल्दी का अधिक मात्रा में सेवन करना चाहिए|
  4. मोतियाबिंद से बचने के लिए आयुर्वेदिक उपाय गाय के दूध का नियमित रूप से सेवन करने पर मोतियाबिंद में आराम मिलता है|
  5. एक चम्मच घी 2 काली मिर्च और थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर इन का पेस्ट बना ले और दिन में दो से तीन बार इसका सेवन करने पर मोतियाबिंद से आराम मिलता है|
  6. दो बूंद प्याज का रस और दो बूंद शहद मिलाकर इसे काजल की तरह रोजाना आंखों में लगाने से मोतियाबिंद की समस्या दूर होती है|
  7. जामुन में एंथोसायनोसाइड्स तथा फ्लेवनाइड्स काफी अधिक होते हैं जो कि रेटिना और आंखों के लैंस की रक्षा करते हैं हालांकि जामुन से मोतियाबिंद पूरी तरह नहीं हटता लेकिन दृष्टि की अस्पष्टता को ठीक किया जा सकता है|
  8. ग्रीन टी से आंखों की रोशनी तेज हो सकती है। रोजाना तीन से चार बार ग्रीन टी पीने आंखों को स्वास्थ्य लाभ होता है। ग्रीन टी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट आंखों को नई ताजगी देते हैं।
  9. कच्ची व हरी सब्जियों में पोषक तत्व और विटामिन ए (Vitamin A) की उच्च मात्रा होती है जो कि आंखों के स्वास्थ्य रखने के जरूरी है। अपने दैनिक आहार में कच्ची सब्जियों को शामिल करें। इससे मोतियाबिंद के साथ ही आंखों की अन्य सामान्य समस्याओं से भी निपटा जा सकता है। 
हरी सब्जियाँ
हरी सब्जियाँ

फेफड़ों के रोग

फेफड़ों के रोग

फेफड़ों के रोग की समस्या एक आम समस्या बन गई है| पहली शुरुआत में तो इसके लक्षण दिखाई नहीं देते लेकिन कुछ लक्षणों के सामने आने पर सही बचाव कर फेफड़ों की बीमारी से बचा जा सकता है| यह महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में अधिक देखने को मिलती है|

फेफड़ों के श्वसन प्रणाली से जुड़े अन्य अंगों को प्रभावित करने वाले लोगों को फेफड़ों के रोग कहा जाता है|सांस से संबंधित समस्याएं फेफड़ों के रोग के कारण होती है इस रोग में मरीज को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल पाती फेफड़ों के रोग किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है|

अगर फेफड़ों के रोग का सही समय पर इलाज नहीं किया जाए तो यह गंभीर रूप धारण कर सकती है इससे व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है|फेफड़ों के रोग में कई लक्षण पैदा हो जाते हैं जिनमें गंभीर रूप से खांसी होना सांस फूलना , छाती में दर्द , बलगम में खून आना आदि लक्षण सामने आते हैं|

फेफड़ों के रोग
फेफड़ों के रोग

फेफड़ों के रोग के दो प्रकार होते हैं

  1. टीबी
  2. फेफड़ों का कैंसर

1.टीबी-टीबी (क्षय रोग) एक घातक संक्रामक रोग है जो कि माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस जीवाणु की वजह से होती है। टीबी आमतौर पर फेफड़ों को प्रभावित करता है| यह रोग हवा के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है जब एक स्वस्थ्य व्यक्ति हवा में घुले हुए इन माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस ड्रॉपलेट न्यूक्लिआई के संपर्क में आता है तो वह इससे संक्रमित हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार विश्व में 2 अरब से ज्यादा लोग टीबी से पीड़ित है| टीबी के मरीज को अपने मुँह पर मास्क या कपड़ा लगाकर बात करनी चाहिए और फेफड़ों के रोग के लक्षण एक दूसरे से मेल खाते हैं|

टीबी के लक्षण

  • रात में पसीना आना
  • सीने में दर्द और सांस का फूलना
  • खांसी के साथ खून आना
  • थकान का अनुभव होनागाकर बात करनी चाहिए और मुँह पर हाथ रखकर खाँसना और छींकना चाहिए। 

2.फेफड़ों का कैंसर-फेफड़ों का कैंसर फेफड़ों से शुरू होता है और शरीर की अन्य अंगों में तेजी से फैलता है खैर वह फेफड़ों के बायो मार्गो से शुरू होता है यह रोग महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में अधिक होता है फेफड़ों में कैंसर का कारण धूम्रपान करना है|

फेफड़ों में होने वाले कैंसर के लक्षण शुरुआत में दिखाई नहीं देते लेकिन कुछ लक्षणों के सामने आने पर फेफड़ों के कैंसर का इलाज समय पर किया जाए तो हम इस रोग की चपेट में आने से बच सकते हैं|

फेफड़ों के रोग के लक्षण

  1. खांसी आना-फेफड़ों की समस्या होने पर लगातार खांसी आना सामान्य है| खांसी एक प्रतिरक्षा प्रणाली है जो जहरीले पदार्थों और बाहरी तत्वों से श्वसन नली को साफ करती है अगर खांसी अधिक आए तो यह फेफड़ों के रोग का संकेत है|
  2. छाती में दर्द होना-छाती में दर्द होना यह फेफड़ों के रोग का मुख्य लक्षण है इसमें मांसपेशियों और हड्डियों से संबंधित कोई भी समस्या होने का खतरा रहता है|
  3. सूजन आना- हाथों और पैरों में सूजन आना फेफड़ों की समस्या का मुख्य लक्षण है|
  4. सांस लेने मी कठिनाई-फेफड़ों की बीमारी होने के कारण फेफड़े खून को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं पहुंचा पाते और कार्बन डाइऑक्साइड को सामान्य तौर पर हटा नहीं पाते तो सांस लेने की समस्या उत्पन्न होती है|
  5. वजन का घटना- फेफड़ों के रोग होने पर शरीर का वजन लगातार घटता रहता है|

फेफड़ों के रोग के कारण

  1. फेफड़ों का कैंसर-लंबे समय से धूम्रपान करना , बीड़ी, सिगरेट, शराब ,तंबाकू का सेवन करने से यह रोग होने की संभावना बढ़ जाती है|यह एक अनुवांशिक स्थिति भी हो सकती है यानी अगर आपकी फैमिली में से किसी एक सदस्य को यह बीमारी हो तो यह आपको भी हो सकती है|
  2. टीबी –यह बैक्टीरिया के कारण होने वाला गंभीर रोग है जो शरीर में धीरे धीरे फैलता है खांसी इसका मुख्य लक्षण है|
  3. अस्थमा-किसी व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई का अनुभव होता है और श्वसन मार्गो में सूजन भी आ जाती है और इस में गांठ भी हो सकती है जिसके कारण सांसे फूलने लगती है|
  4. सीओपीडी-इसमें रोगी व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई आ सकती है इसका मुख्य कारण है धूम्रपान करना जो लोग काफी टाइम से धूम्रपान करते हैं उनको यह रोग हो जाता है|

फेफड़ों के रोगों से बचने के लिए आयुर्वेदिक नुस्खे

  1. शहद- प्रतिदिन सुबह एक चम्मच शहद का सेवन करना चाहिए लगातार यह 2 से 3 महीने करने से फेफड़ों के रोग दूर होते हैं|
  2. लहसुन –खाना खाने के बाद मिथुन का सेवन करना चाहिए ऐसा करने से आप फेफड़ों के रोगों से बच सकते हैं|
  3. मुलेठी- मुलेठी का प्रयोग फेफड़ों के लिए बहुत ही लाभदायक है पानी में डालकर मुलेठी का सेवन करने से खांसी में आराम मिलता है|
  4. शहतूत के पत्ते- शहतूत के पत्ते चबाने से सिर दर्द खांसी फेफड़ों के रोगों का नाश होता है|
  5. तुलसी- तुलसी के सूखे पत्ते ,कत्था ,कपूर और इलायची समान मात्रा में लीजिए इसमें 9 गुना चीनी मिलाकर बराबर मात्रा में पीस लीजिए इस पेस्ट का सेवन करने से आपके फेफड़ों के रोग दूर हो जाते हैं|
  6. अंजीर-6 से 7 अंजीर को एक गिलास पानी में उबालकर दिनमें दो बार सेवन करने से फेफड़ों के रोग से आराम मिलता है|
  7. अंगूर- खांसी जैसी बीमारियों को दूर करने में अंगूर बहुत ही फायदेमंद है अगर आप को शुगर है तो अंगूर का सेवन ना करें|
मुलेठी
मुलेठी

डाउन सिंड्रोम

डाउन सिंड्रोम

डाउन सिंड्रोम एक अनुवांशिक बीमारी है अर्थात इस बीमारी को बौद्धिक विकलांगता भी कहते हैं |इस बीमारी में शिशु बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास बहुत धीरे से होता है और कभी- कभी विकलांगता जैसी समस्या का सामना भी करना पड़ता है| डाउन सिंड्रोम से पीड़ित रोगी की देखभाल करनी बहुत ही आवश्यक है| इस बीमारी में विकलांगता जीवन भर भी बनी रहती है और इसकी वजह से कई मरीजों की मृत्यु भी हो जाती है|

इस बीमारी में कई शिशु बच्चों का दिमाग भी छोटा होता है इस बीमारी में बच्चा कई बार बात करने में भी असमर्थ हो जाता है|

डाउन सिंड्रोम
डाउन सिंड्रोम

डाउन सिंड्रोम के प्रकार

डाउन सिंड्रोम के तीन प्रकार होते हैं-

  1. ट्राई सोमी 21-यह वह स्थिति है जिसमें शरीर में मौजूद प्रत्येक कोशिकाओं में दो की बजाय क्रोमोसोम 21 की तीन कॉपी होती है|
  2. ट्रांसलोकेशन डाउन सिंड्रोम-इस प्रकार के डाउन सिंड्रोम में प्रत्येक कोशिकाओं में पूरा एक किया कुछ अतिरिक्त क्रोमोसोम 21 का भाग मौजूद होता है लेकिन यह स्वयं के बजाय किसी और क्रोमोसोम से जुड़ा होता है|
  3. मोजैक डाउन सिंड्रोम-यह दुर्लभ प्रकार का डाउन सिंड्रोम है जिसमें सिर्फ कुछ ही कोशिकाएं के पास अतिरिक्त क्रोमोसोम 21 होता है| मोजैक डाउन सिंड्रोम से पीड़ित मरीज में अधिक लक्षण दिखायी नहीं देते हैं क्योंकि इसमें सिर्फ कुछ ही कोशिकाओं (cells) के पास अतिरिक्त क्रोमोसोम होता है।

डाउन सिंड्रोम के लक्षण

  • कान और गर्दन छोटे होते है।
  • लचीलापन अधिक होता है।
  • कद भी बहुत छोटा होता है।
  • नाक और चेहरा चपटा होता है।
  • आँखें ऊपर की तरफ झुकी होती है।
  • इसमें रोगी की टांगे पतली होती है|
  • इस रोग में बच्चा कई बार बोलने में भी असमर्थ होता है |
  • इसके अलावा उम्र बढ़ने के साथ मोटापे की समस्या होना भी बहुत आमहोता और वह हृदय रोगों से भी पीड़ित हो सकता है।
  • इस रोग में बच्चे का दिमाग छोटा होता है|
  • चीजों को समझने की कम क्षमता|

डाउन सिंड्रोम होने के कारण

जब शिशु का जन्म होता है तो सामान्य तौर पर वह 46 क्रोमोसोम के साथ जन्म लेता है। 23 क्रोमोसोम पिता से और 23 क्रोमोसोम माता से ग्रहण करता है। लेकिन डाउन सिंड्रोम शिशु में एक क्रोमोसोम अधिक होता है जिसे 21 वां सिंड्रोम कहते है। जिसके कारण शरीर में 47 क्रोमोसोम हो जाते है जो मानसिक और शारीरिक विकास में बाधा उत्पन्न करता है।

डाउन सिंड्रोम से बचने के लिए उपाय

  • मानसिक और बौद्धिक विकास का इलाज करवाने के लिए किसी अच्छे चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए और स्पीच थेरेपी और फिजियो थेरेपी जरूर करवानी चाहिए|
  • समय-समय पर बच्चे की सभी प्रकार की जांच करवानी चाहिए |
  • डाउन सिंड्रोम से पीड़ित मरीज का इलाज कराकर और उसे अपना सहयोग देकर उसके जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है।
  • उम्र बढ़ने के साथ ही डाउन सिंड्रोम से पीड़ित मरीजों को शारीरिक क्रियाओं के लिए दूसरे व्यक्ति के मदद की हमेशा जरूरत पड़ती है।

बच्चों की उल्टी

बच्चों की उल्टी

बच्चों की उल्टी (Vomiting) बच्चे की जठरांत्र प्रणाली को अपने पेट में बुरी चीजों से छुटकारा पाने में मदद करता है| लेकिन आपका छोटा बच्चा लगतार या बहुत अधिक बार उल्टी करता है, तो यह अंतर्निहित कारण हो सकता है| यदि आप अक्सर अपने बच्चों की उल्टी (Vomiting) के कारण चिंतित है तो मुहं के माध्यम से पेट की सामग्री का सशक्त निष्कासन या कभी-कभी यह नाक के द्वारा भी संभव है|

बच्चा यह तभी करता है, जब उसके पेट में भोजन की अधिकता, जठरांत्र, दूषितभोजन या फिर उसको कोई बीमारी हो| तो आपको बच्चे के लिए चिकित्सक की सलाह में यह सुनिश्चित करना चाहिए की इसका कारण क्या है| बिना बीमारी की उल्टी एक स्वभाविक क्रिया है, यह कोई बीमारी नही है| कुछ बच्चों की उल्टी (Vomiting) के सामान्य प्रकार इस प्रकार है, जैसे-

  1. दूध का फटना-यह जब होता है, जब आपका बच्चा स्तनपान करता है, तो उसके पेट में दूध की मात्रा की अधिकता के कारण हो सकता है|
  2. प्रतिवाह-यह उल्टी (Vomiting) आमतौर पर शिशुओं में होती है, जब बच्चे का शीर्ष बाल्व गलती से खुला रह जाता है, तो भोजन, भोजन पाइप से उल्टा आ सकता है, यह कोई बीमारी नही है| यह समय के साथ ठीक हो जाता है|
  3. उल्टी का प्रक्षेप्य-ऐसा तब होता है, जब आपका बच्चा अपने पेट की सामग्री का एक शक्तिशाली तरीके से उजागर करता है|
  4. भोजन एलर्जी-आपके बच्चे के पेट में एक अवांछित प्रक्रिया को भडकाने के लिए कई खाद्य पदार्थ मौजूद हो सकते है, जैसे-अंडे, मूंगफली, सेलफिस, गेहूं और दूध आदि|आपका बच्चा एलर्जी वाले खाद्य पदार्थ ग्रहण करने के बाद उल्टी और उसके साथ दर्द का अनुभव भी कर सकता है|
बच्चों की उल्टी
बच्चों की उल्टी

बच्चों की उल्टी के लक्षण

  • जी मिचलाना और निर्जलीकरण
  • चक्कर आना और तेजी से दिल का धडकना
  • पिली त्वचा और चिडचिडाप
  • नींद, दस्त और बुखार का होना
  • पेट दर्द, सुजन और लार का टपकना
  • गंभीर सिरदर्द और भूख की कमी

बच्चों की उल्टी करने के कारण

  1. खाने से एलर्जी होने पर शिशु का मुह से दूध निकलना
  2. फ़ूड पोइसोनिंग के कारण के शिशु को उल्टी होना
  3. शिशु का दूध निकालना एपेंडिसाइटिस के कारण
  4. गैस्ट्रोएंटेरिटिस आंत का संक्रमण है। यह शिशु में उल्टी का एक आम कारण होता है और आमतौर पर कुछ दिनों तक रहता है।

बच्चों को होती है बार-बार उल्टी तो तुरंत करें उपाय

  1. नींबू-जब बच्चे को गर्मी लग जाने की वजह से उल्टी हो रही हो तो ऐसे में आप बच्चे को थोड़े से पानी में नमक और नींबू का रस मिलाकर पिलाएं। यह घोल बच्चे को दिन में 2 से 3 बार पिलाएं उससे अधिक न दें।
  2. प्याज-यदि बच्चे को कुछ पच नहीं रहा तो आप प्याज को कद्दूकस करके उसका रस बच्चे को दिन में दो से तीन बार दें। इससे बच्चों की उल्टी बंद हो जाती है।
  3. अदरक-छोटे बच्चे अदरक खाना पसंद नहीं करते। इसलिए आप उन्हें अदरक वाली चाय दे सकते हैं। इससे उनका जी मचलाना बंद हो जाएगा और वे खाने-पीने भी लगेंगे।इससे पाचन क्रिया भी बेहतर होती है। 
  4. अनार का रस-जब बच्चे को उल्टियां हों तो आप उसे नींबू का रस और अनार का रस मिलाकर पिलाएं।इससे उल्टी बंद हो जाती हैं। आप चाहे तो इसमें शहद भी मिला सकतीं हैं।
  5. चावल का पानी-उल्टी यदि गैस के कारण हो रहीं हैं तो उसे उबले हुए चावल का पानी पिलाएं।दिन में तीन बार 2 से 3 चम्मच चावल का मांड पिलाएं। इससे बच्चों की उल्टी आना बंद हो जाएगी।
  6. काढ़ा-धनिया, सौंफ, जीरा, इलायची तथा पुदीना सभी को सामान मात्रा में लेकर पानी में भिगो दें। इसके बाद जब ये सारी चीजें फूल जाएं तो इन्हें पानी में ही मसल लें और इस पानी को छान लें। इस के बाद आप इस पानी को बच्चे को दिन में 3 से 4 बार पिलाएं। इससे बच्चे की उल्टी होना बंद हो जाएगी।
काड़ा
धनिया, सौंफ, जीरा, इलायची ,लोंग

थायराइड क्या है

थायराइड क्या है

थायराइड एक प्रकार की ग्रंथि होती है जो गर्दन मे स्थित होती है|आजकल कई लोग थायराइड बीमारी से पीड़ित हैं| थायराइड में वजन बढ़ने के साथ हार्मोन असंतुलन भी हो जाते हैं. एक स्टडी के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं में थायराइड विकार दस गुना ज्यादा होता है| इसका मुख्य कारण है महिलाओं में ऑटोम्यून्यून की समस्या ज्यादा होना है| हेल्थ एक्सपर्ट केमुताबिक, थायराइड हार्मोन शरीर के अंगों के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी होते हैं|इस रोग में कई-कई महिलाओं का वजन घट भी जाता है|थायराइड को साइलेंट किलर भी कहा जाता है क्‍योंकि इसके लक्षण एक साथ नही दिखते है। अगर आपके परिवार में पहले किसी को यह समस्या रही हो, तो आपको भी थायराइड होने की आशंका ज्यादा रहती है|

थायराइड
थायराइड

थायराइड के लक्षण

  1. थायराइड में महिलाओं का वजन घट जाता है|
  2. कई महिलाओं में थायराइड के कारण महिलाओं का वजन बढ़ भी जाता है |
  3. थायराइड में महिलाओं को अधिक पसीना आने की संभावना होती है |
  4. इस रोग मे महिलाओं के दिल का तेजी से धड़कना , कमजोरी , चिंता इत्यादि लक्षण सामने आते है|
  5. इस रोग मे महिलाएं थकान महसूस करती है|
  6. इस रोग मे महिलाओं को कब्ज की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है |
  7. इस रोग मे महिलाओं की त्वचा और बालों में रूखापन आ जाता है|
  8. थायराइड के कारण स्मरण शक्ति और सोचने-समझने की क्षमता  भी प्रभावित होती है। याददाश्त कमजोर हो सकती है और व्यक्ति का स्वभाव भीचिड़चिड़ा हो सकता है।
  9. थायराइड होने पर भूख तेज लगने के बाद भी खाना नहीं खाया जाता |

इन सभी समस्याओं को आम समझकर ज्यादातर लोग इग्नोर करते रहते हैं जो बाद में खतरनाक साबित हो सकता है और कई बार तो जानलेवा साबित हो सकता है।थायराइड की वजह से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है|

थायराइड के कारण

  1. थायरायडिस-यह सिर्फ एक बढ़ा हुआ थायराइड ग्रंथि (घेंघा) है, जिसमें थायराइड हार्मोन बनाने की क्षमता कम हो जाती है।
  2. आयोडीन की कमी-भोजन में आयोडीन की कमी या ज्यादा इस्तेमाल भी थायराइड की समस्या में इजाफा करता है। 
  3. गर्भावस्था-थायराइड का अगला कारण है गर्भावस्था, जिसमें प्रसवोत्तर अवधि भी शामिल है। गर्भावस्था एक स्त्री के जीवन में ऐसा समयहोता है जब उसके पूरे शरीर में बड़े पैमाने पर परिवर्तन होता है, और वहतनाव ग्रस्त रहती है।

थायराइड को कम करने के घरेलू नुस्खे

  1. अश्वगंधा-अश्वगंधा को  जड़ी-बूटियों की श्रेणी में रखा जाता है। यहआयुर्वेदिक जड़ी-बूटी थायराइड हार्मोंस को संतुलित करने के लिए चमत्कारी तरीके से काम करती है ।अक्सर, इसका इस्तेमाल प्रतिरोधक क्षमता व तनाव को कम करके शारीरिक क्षमता को बेहतर करने में भी सक्षम है। इन तमाम खूबियों के कारण ही थायराइड के इलाज में अश्वगंधा बेहरत विकल्पहै।
  2. अलसी-अलसी के पाउडर को दूध या फिर फलों के रस में डालें।अब इसे अच्छी तरह मिक्स करें और पिएं।आप इस मिश्रण को प्रतिदिन एक से दो बार पी सकते हैं।आप इस मिश्रण को प्रतिदिन एक से दो बार पी सकते हैं।अलसी थायराइड हार्मोंस के निर्माण में मदद करती है|इसमें मैग्नीशियम और विटामिन-बी12 भी होता है, जो शरीर की कार्यप्रणाली मेंसुधार लाते .हैं और हाइपो थायराइड के लक्षणों को खत्म करने का काम करते हैं।
  3. अदरक-अदरक को बारीक टुकड़ों में काट ले व पानी को गर्म करें और अदरक के टुकड़े उसमें डाल दें।अब पानी को हल्का गर्म होने के लिए रख दें। फिर उसमें शहद डालकर मिक्स करें और चाय की तरह पिएं। य्ह लाभ्कारी उपाय हैअदरक की चाय को दिन में तीन बार पिया जा सकता है।
  4. नारियल तेल-नारियल तेल में मध्यम स्तर का फैटी एसिड होता है, जो कई लिहाज से गुणकारीहै। प्रतिदिन नारियल तेल का सेवन करने से शरीर का मेटाबॉलिज्म व तापमान बेहतर होता है, जिससे हाइपो थायराइड के असर को व साथ हीवजन को भी कम किया जा सकता है।अगर आप नारियल तेल को थायराइड के घरेलू उपचार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, तो आपको जल्द आराम मिल सकता है।
  5. धनिया का पानी-रात को सोते समय 1 से 2 चम्मच धनिया को तांबे के बर्तन मे भिगो कर रख दें फिर सुबह उठकर भीगी धनिया को मसलकर धनिया के पानी को छानकर इसका सेवन करने से थायराइड को काफी हद टीके कम किया जा सकता है|
  6. पत्ता गोभी- पत्ता गोभी मे गोइट्रोंजस बहुत अधिक मात्रा मे पाया जाता है जो थायराइड हार्मोन के उत्पादन को कम करने मे सहायक है|

खून की कमी

खून की कमी

खून की कमी तब होती है जब हमारे शरीर मे लाल रक्त कोशिकाओं के नष्ट होने की दर, उनके निर्माण की दर से अधिक होती है| शरीर मे खून की कमी हो जाने पर इंसान कमजोरी ,थकावट ,आंखो मे पीलापन ,दिल की धड़कन का असामान्य होना आदि बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं|ऐसा ज़्यादातर शरीर मे आयरन की कमी के कारण होता है जिससे रक्त कोशिकाएं भी कमजोर पड़ जाती है जिससे ऑकसीजन का प्रवाह ठीक ढंग से नहीं हो पाता इससे हमारे कार्य करने की क्षमता भी कम हो जाती है|

खून की कमी के लक्षण

  1. अगर बच्चे में खून की कमी है तो, वह सफेद लगेगा आप बच्चे की हथेली को देखेंगे तो वह आपको ज्यादा सफेद लगेगी और आप नॉर्मल हाथों से कंपेयर कर सकते हैं तो आपको अंतर पता चलेगा| जिन बच्चों में खून की कमी नहीं होती है, उनकी हथेलियां थोड़े से गुलाबी से लाल रंग की होती है और जिन बच्चों में खून की कमी होती है उनके हथेलियां सफेद रंग की होती है|
  2. बच्चे का चिड़चिड़ा होना-अगर बच्चे में खून की कमी होगी तो बच्चा चिड़चिड़ा हो जाएगा|
  3. बच्चों में बुखार आना- सर्दी जुकाम होना भी खून की कमी होने का महत्वपूर्ण लक्षण है इसने बच्चों की ग्रोथ कम हो जाएगी और वजन भी नहीं बढ़ेगा|
  4. भूख कम लगना- इन दिनों में बच्चा कम खाने लगता है या खाना खाने में आनाकानी करता है|
  5. सांस लेने में परेशानी होना- इस समस्या में बच्चा सही तरह से सांस नहीं ले पाता है और उसकी सांस फूलने लगती है|
  6. दिल की धड़कनें तेज होना- बच्चे के शरीर में ऑक्सीजन की कमी के कारण हृदय तेजी से धड़कने लगता है|
  7. बच्चों की त्वचा पीली होना –एनीमिया की समस्या में बच्चे की त्वचा बेजान और पीले रंग की हो जाती है और ऐसा मुख्यतः बच्चों की आंखों के नीचे और हाथों पर होता है|
  8. कमजोरी आना- खून की कमी के चलते बच्चा कमजोरी महसूस करता है और सुस्त हो जाता है |

खून की कमी के कारण

  1. ज़्यादा खून बहना- बच्चे की नाक से खून आना या किसी चोट के लग जाने पर  रक्त का बहना पाचन तंत्र की सूजन भी खून की कमी का कारण बन सकता है|
  2. आयरन की कमी- लाल रक्त कोशिकाओं में हिमोग्लोबिन होता है जो आयरन युक्त प्रोटीन से बनता है हिमोग्लोबिन शरीर के सभी अंगो में ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है बच्चों में शरीर के विकास के दौरान आयरन की कमी से एनीमिया होने की संभावनाएं बढ़ जाती है|
  3. आयोडीन की कमी-बच्चों में आयोडीन की कमी से बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो पाता है यह भी मुख्य कारण है|
  4. रेड ब्लड सेल्स का देरी से नष्ट होना-जब शरीर के रक्त में लाल कणों या कोशिकाओं के नष्ट होने की दर उनके निर्माण की सबसे अधिक होती है तब एनीमिया की समस्या उत्पन्न होती है|
  5. रेड ब्लड सेल्स की संख्या का कम होना– शरीर में रेड ब्लड सेल्स या हिमोग्लोबिन की संख्या कम होने पर हम कई बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं जैसे-एनीमिया की समस्या|
  6. कब्ज और हीमोग्लोबिन-कब्ज और गैस भी खून की कमी का मुख्य कारण है|
  7. विटामिन की कमी– शरीर में विटामिन B12 की कमी के कारण शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी होने लगती है जिससे खून की कमी हो जाती है|इसके साथ- साथ शरीर में मैग्नीशियम कैल्शियम पोटेशियम की कमी के कारण भी खून में कमी आ जाती है|
Red-blood-cells
रेड ब्लड सेल्स (Red-blood-cells)

कुछ विशेष प्रकार की जड़ी-बूटियों का उपयोग करके भी शरीर में हीमोग्‍लोबिन के स्‍तर को बढ़ाया जा सकता है। यद्यपि कुछ मसाले जैसे-अजवायन, पुदीना और जीराआदि भी आयरन के अच्‍छे स्रोत माने जाते हैं जिनका नियमित सेवन करने सेआपके शरीर में लोहे की दैनिक जरूरत को पूरा किया जा सकता है। इसके अलावा भीआप कुछ अन्‍य जड़ी बूटियों (Herbs) का इस्‍तेमाल कर सकते हैं जो आपके लिएबहुत ही फायदेमंद हो सकते हैं जैसे कि शतावरी या बिच्छू बूटी (Nettle Leaf) आदि। ये जड़ी बूटियां आपके हीमोग्‍लोबिन के स्‍तर को बढ़ाने में मदद करतीहैं। नेटल (बिच्छू बूटी) के पत्‍तों में लोहा, विटामिन बी और सी के साथबहुत से विटामिन होते हैं जो लाल रक्‍त कोशिकाओं को बढ़ाने में मदद करतेहैं।

खून की कमी को दूर करने के लिए व्‍यायाम करें

आप अपनी दिनचर्या में कुछ प्रकार के व्‍यायाम शामिल करें। जब आप व्‍यायाम करते हैं, तो आपके पूरे शरीर में ऑक्‍सीजन की ज्‍यादा आवश्‍यकता होती हैजिसे पूरा करने के लिए शरीर द्वारा अधिक लाल रक्‍त कोशिकाओं का उत्‍पादनकिया जाता है। आप व्‍यायाम अपके शरीर को तंदुस्‍त और क्रियाशील बनाए रखनेमें मदद करता है। इसलिए अपने शरीर मे हीमोग्‍लोबिन के स्‍तर को बढ़ाने के लिए आप नियमित व्‍यायाम शुरु करें।

  1. आपको अपने भोजन में लस (gluten) युक्‍त खाद्य पदार्थों का उपयोग करने से बचना चाहिए।
  2. पूरे अनाज (Whole grains), अनाज की रोटी और पास्‍ता का सेवन करना चाहिए।
  3. यदि आपके शरीर में हीमोग्‍लोबिन की कमी है तो आपको ऐसे खाद्य पदार्थोंसे बचना चाहिए जो आपके शरीर में लोहे के अवशोषण को रोकने का काम करते हैं।यदि आप ऐसे खाद्य पदार्थों का नियमित रूप से सेवन करते हैं तो यह आपके शरीरमें हीमोग्‍लोबिन के स्‍तर को कम कर सकता है। ऐसे कुछ खाद्य पदार्थों मेंशामिल हैं :
  • कॉफी|
  • चाय|
  • शीतल कार्बनिक पेये जैसे कोला आदि|
  • वाइन|
  • बीयर आदि|

4. फोलेट (Fol-ate) एक प्रकार का विटामिन बी है जो हीमोग्‍लोबिन उत्‍पादन मेंएक आवश्‍यक भूमिका निभाता है। हमारा शरीर हीमोग्‍लोबिन का उपत्‍पादन करनेके लिए फोलेट का उपयोग करता है। हीमोग्‍लोबिन आपके संपूर्ण शरीर में ऑक्‍सीजन (Oxygen) के परिवहन का काम करता है। अगर किसी व्‍यक्ति कोपर्याप्‍त मात्रा में फोलेट नहीं मिलता है तो उनके शरीर में मौजूद लालरक्‍त कोशिकाएं परिपक्व नहीं हो पाती हैं, जिससे शरीर में हींमोग्‍लोबिन के स्‍तर में कमी और एनीमिया (Anemia) का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए फोलेट के अच्‍छे स्रोत वाले खाद्यपदार्थों का सेवन करना चाहिए जिनमें शामिल हैं, पालक, चावल, मूंगफली, राजमा, सलाद आदि।

5.शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर को बढ़ाने के लिए सब्जियों का सेवन बहुत ही लाभदायक है क्योंकि सब्जियों में पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व मौजूद रहते हैं शरीर में खून बढ़ाने के लिए आप पालक और चुकंदर आदिवासियों का प्रयोग कर सकते हैं आसानी से उपलब्ध भी हो जाते हैं शरीर में हीमोग्लोबिन बढ़ाने के लिए पालक सबसे अच्छा विकल्प है जो बहुत फायदेमंद है|